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जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी अब हुर्रियत नेताओं को भी धमकाने लगे हैं। हिजबुल मुजाहिद्दीन के कमांडर जाकिर मूसा ने ऑडियो टेप जारी कर हुर्रियत नेताओं को धमकी दी है और उनकी भूमिका पर सवाल उठाया है। मूसा ने धमकी देते हुए कहा है कि ‘इस्लाम के लिए आतंकियों के संघर्ष में उन्होंने यदि दखल दिया तो उनका सिर काटकर लाल चौक पर लटका दिया जायेगा। ऐसे में अब सवाल उठने लगा है कि अब इस धमकी के बाद भी हुर्रियत नेता कश्मीर के हालात को शांत कराने के लिए सरकार का साथ देंगे या उन्हे मिली इस नई धमकी से वो डर जायेंगे और खुद को अलग-थलग कर लेंगे?

शनिवार 13 मई को एपीएन न्यूज के खास कार्यक्रम मुद्दा में दो अहम विषयों पर चर्चा हुई। इसके पहले हिस्से में हुर्रियत को हिजबुल द्वारा मिली हुई चुनौती पर चर्चा हुई। इस अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे।  इन लोगों में रिटायर्ड ब्रिगेडियर बी डी मिश्रा (रक्षा विशेषज्ञ), हसीब सिद्दीकी (वरिष्ठ पत्रकार)  के के शुक्ला ( नेता बीजेपी), शहजाद पूनावाला ( नेता कांग्रेस) शामिल थे।

बी डी मिश्रा ने कहा कि कही पर अगर कानून व्यवस्था कायम रखना पुलिस से बाहर हो जाती है तो सेना वहां पर हस्तक्षेप करती है। जम्मू कश्मीर में सेना बहुत दिन से है बहुत दिन से घटनांए घट रही हैं लेकिन अगर वहां पर किसी पर विश्वास कर सकते हैं तो सेना पर। वहां पर जब बाढ़ आती है तो यही सेना के जवान उनको बचाते हैं उनको सुरक्षा देते है। जो जाकिर मूसा की धमकी है इसमें साफ संदेश है कि वहां पर यह आइएसआइएस के तरीके से चल रहा है।

हसीब सिद्दीकी ने कहा कि कश्मीर की स्थिति इतनी खराब आज तक नही हुई जितनी आज है। 1986 में भी जब वहां आंतकवाद ने जन्म लिया तब भी स्थिति ऐसे खराब नही थी। बीच में हालात काफी सुधर गये थे। अटल जी जब आये तो कश्मीरी अटल जी के पक्ष में आये उनकी नीति को समर्थन दिया। लेकिन ये जो हमारी सरकार आयी है ये तय नही कर पा रही है कि क्या करना है।

के के शुक्ला ने कहा कि बीजेपी शुरु से यह कह रही है कि देश के संविधान के दायरे में जो भी बात करना चाहता है उससे बीजेपी बात करने को पूर्णतया तैयार है। देश की सरकार अलगाववादियों से तब तक बात नही करेगी जब तक कि भारत का अभिन्न अंग है कश्मीर इस सोच के साथ और देश के संविधान में विश्वास करते हुए अपना आचरण नही करेंगे हम बात नही करेंगे।

आरएसएस तृणमूल में सियासी घमासान

इसके दूसरे हिस्से में आरएसएस और तृणमूल में सियासी घमासान पर चर्चा हुई। इस अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए भी विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे। इन लोगों में, के के शुक्ला, शहजाद पूनावाला, डॉ सौरभ मालवीय ( संघ विचारक आरएसएस), हसीब सिद्दीकी शामिल थे।

कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के उस आदेश पर स्टे लगा दिया है जिसमें आरएसएस से संबंधित विद्या भारती के विद्यालय को बंद करने को कहा गया था। कोर्ट ने जुलाई के अंत तक सरकारी आदेश पर रोक लगा दी है। दरअसल ये एक अदद मामला आरएसएस संचालित स्कूलों के प्रति राज्य सरकार के रुख को दर्शाता है। अब सवाल ये उठने लगा है कि तृणमूल और आरएसएस का विवाद आखिर क्या नतीजे लायेगा, ममता बनर्जी आरएसएस और उसके सरस्वती शिशु मंदिर के नीतिओं को जैसा दिखाना चाहती है क्या सच में उसकी नीतियां ऐसी है ?

 सौरभ मालवीय ने कहा कि देशभर में दो लाख शिक्षक हैं और 40 लाख छात्र हैं। सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ने वालों की ये संख्या है। किसी भी देश के विकास की प्रक्रिया में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है और जब शिक्षक पर तुष्टीकरण की राजनीति की जाये तो उसका मानस साफ तौर दिखता है कि उसका मानस क्या है। वो हतासा की शिकार हैं तभी इस तरह के कदम उठा रही हैं। डेढ़ लाख मुस्लिम विद्यार्थी सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ते हैं और महाराष्ट्र बोर्ड में एक आदिवासी विद्यार्थी ने मराठी भाषा में सर्वाधिक अंक पाया वो सरस्वती शिशु मंदिर का विद्यार्थी था।

शहजाद पूनावाला ने कहा कि हमारे संविधान में लिखा गया है कि अगर आप नीजि स्कूल चला रहे हो आप चला सकते हो पर अगर आपको सरकार से कोई भी फंड मिलता है उसमें धार्मिक चीजें नही सिखाई जा सकती हैं। अगर इन स्कूलों को सरकारी समर्थन प्राप्त है इसमें ये कुछ ऐसी चीजें सीखा रहे हैं जो एक ही धर्म से जुड़ी है तो वो संविधान के तहत नही है।

के के शुक्ला ने कहा कि पूनावाला जी को सरस्वती शिशु मंदिर के इतिहास की जानकारी का अभाव है। संघ क्या ज्यादातर विद्यालय अपने नीजि संसाधनों से चलते हैं और सरकारी अनुदान पर निर्भर नही रहते हैं। सरकारी अनुदान पर आप किसी भी धर्म के प्रति विद्वेष की भावना नही जागृत कर सकते हैं।

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