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मां का कोई घर नहीं है, न ही वो किसी गांव और शहर में रहती हैं। वो कल किसके हिस्से में थी और आज किसके हिस्से में हैं, यह आज तक न कोई बता पाया है और न शायद कोई कभी यह बता सके। यहां तक कि मां भी आज तक खुद ही नहीं जान पाईं कि वो कौन थी और आज कौन हैं। यह वो सबसे आसान सवाल है जिसका जवाब यक्ष प्रश्न के जवाब देने जैसा है। आपको याद है कि आखिरी बार आपने अपनी मां को कहां देखा था?

मां बाबूजी की धर्मपत्नी ज्यादा है क्योंकि जीवन भर मां ने धर्म ही तो निभाया है| कभी बेटी का, तो कभी बहु का, तो कभी बीबी का और अंत में माँ का भी। मुझे याद है कि आखिरी बार मैंने अपनी मां को अपने घर की देहरी पर देखा था। मैं जब भी घर गई या वापस आई मां मुझे उसी देहरी पर बैठी ही मिली। मां से जब भी पूछा कि तुम हमेशा यहीं क्यों बैठी मिलती हो, तो मां ने कहा कि देहरी से दरवाजे पर आता जाता हर कोई आसानी से दिख जाता है और मेरी आंखों का लंबा इंतजार यहीं से शुरू होता है और यहीं पर खत्म भी हो जाता है। मां और मां का इंतज़ार! मां जैसा इंतजार सिर्फ मां ही कर सकती है। उनकी बड़ी बड़ी आंखों के कारे काजल लगभग धुल ही गये थे जब वो मुझे विदा करने आईं थी वो भी सिर्फ देहरी तक। सच में आज की माँ ने एक लम्बा सफर तय किया है देहरी से दरवाजे तक।

मां आज वो सूती साड़ी में, मांग में सिंदूर लगाए, जुड़ा बांधे एक दौड़ती भागती, अस्त -व्यस्त औरत की कल्पना से अलग है। मां अब जीन्स पहने लम्बे खुले बालों वाली कोई लेडी है। वो पापा के नाम से नहीं जानी जाती, वो अपने काम से जानी जाती है। मां आज इंदिरा नोई, चंदा कोचकर, सुषमा स्वराज और मैरी कॉम है। मां सिर्फ अब खाना ही नहीं बनाती, फाइटर प्लेन भी उड़ाती है। मां ने तमाम मौसम पार कर लिया है। उसने घर की चार दीवारों को लांग लिया है। वो छज्जे छप्पर सब फांद गई है। अब वो हमारा इंतजार नहीं करती। आज वो आजाद है, हर रिवाजों से, हर बंधनों से और समाज की हर कुरीतियों से। माँ का घर अब उनके सपने हैं जो अब वो जीती है और खुल के पूरे करती है। मां को उड़ते देखना ज्यादा सुखदायक है। मां ने हमेशा हमें आगे बढ़ने और उड़ने की प्रेणना दी है पर उन्हें आगे बढ़ते देखना सबसे खूबसूरत क्षण होता है।

मां का घर अब मेरे घर की देहरी नहीं है और न ही उनकी नजर दरवाजे पर है। मां का घर आज किसी ऑफिस का केबिन है। मां का घर संसद है। मां की नजर हमारे देश के नये स्पेस रिसर्च प्रोजेक्ट पर है। मां की नजर तमाम देश विदेश के मुद्दों पर है। मां अब चुप नहीं रहती, मां अब बहस करती है। मां अब किसी लड़ाई की रिपोर्टिंग भी करती हैं तो अपने बच्चे के नाम कोमल अक्षरों में प्यार भरे खत भी लिखती है। माँ बहुत बदल गई हो तुम। मां तुम बहुत बिजी होती जा रही हो, पर फिर भी कहीं से आकर भी तुम सबसे पहले हमें ही ढूढती हो। इसलिए तुम मॉम हो, या मम्मा बन जाओ पर रहोगी तुम मां ही और हम तुम्हारे बदमाश बच्चे। थैंक यू माँ….. कि तुम उड़ रही हो.. अपनी उड़ान भर रही हो। और अब तुम्हारा सफर देहरी से दरवाजे तक नहीं, फर्श से अर्श तक का हो चला है।

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