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लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, उमा भारती वगैरह पर अब 25 साल बाद फिर मुकदमा चला है, बाबरी मस्जिद तोड़ने और सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने के लिए ! इस मरे हुए मुकदमे को जिंदा किसने किया है, सीबीआई और सीबीआई अदालत ने ! सीबीआई को कौन चलाता है ? सरकार चलाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस अदालत को दो साल की मोहलत दी है लेकिन दो साल के पहले ही भारत के दो बड़े चुनाव निपट जाएंगे। एक राष्ट्रपति का और दूसरा उप-राष्ट्रपति का। राष्ट्रपति का चुनाव तो अगले दो माह में ही निपटना है। विपक्षी पार्टियां अभी ही उमा भारती से इस्तीफा मांग रही हैं। वे कहती हैं कि इतने संगीन अपराधों की आरोपी महिला, मंत्री कैसे रह सकती हैं ? यदि कोई इन आरोपों के कारण मंत्री नहीं रह सकता तो वह फिर राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति भी नहीं बन सकता। अर्थात् आडवाणी और जोशी के सारे अवसर खत्म !यह नरेंद्र मोदी के अब तक के प्रधानमंत्री-काल की सबसे बड़ी चुनौती है। भारत का कोई कानून किसी आरोपी को कोई भी चुनाव लड़ने से रोक नहीं सकता। यदि आडवाणी और जोशी, दोनों राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों की उम्मीदवारी का फार्म भरें तो उन्हें कौन रोक सकता है ? यहीं मोदी की परीक्षा होगी। मोदी का यह परम पुनीत कर्तव्य बनता है कि वे अपने इन दोनों नेताओं को सर्वोच्च पदों पर आसीन करवाएं। दोनों ही इन पदों के लिए सर्वथा योग्य हैं। इन्हें पदारुढ़ करवा कर मोदी अपना कर्ज भी चुकाएंगे। मोदी को याद होगा कि 2002 में गुजरात में राजधर्म के उल्लंघन पर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी उन्हें गोवा के भाजपा अधिवेशन में मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे लेकिन उन्हें बचाया किसने ? लालजी ने, आडवाणीजी ने ! यदि मोदी अहसान-फरामोश इंसान नहीं हैं तो यह मौका है कि वे इसे सिद्ध करें। इससे उनकी छवि भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं के बीच चमकेगी। खुद मोदी को बड़ा आदमी बनने का मौका मिलेगा। बड़ी कुर्सी में बैठ जाने से कोई आदमी बड़ा नहीं बन जाता है, बड़े काम करने से वह बड़ा आदमी बनता है। राष्ट्रपति के चुनाव के ऐन मौके पर इस मुकदमे में आडवाणीजी और जोशीजी को फंसाने के कई अप्रिय अर्थ निकाले जाएंगे। उन सब संशयों और अनर्थों से मुक्त होने का यही तरीका है कि इन दोनों निष्कलंक, अनुभवी और वयोवृद्ध नेताओं को उनके योग्य पदों का उम्मीदवार बना दिया जाए।

डा. वेद प्रताप वैदिक

Courtesy: http://www.enctimes.com

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