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मध्यप्रदेश में बयानों के तीर खूब उड़ रहे हैं। कोई घायल कर रहा है तो कोई हो रहा है तो कोई बता रहा है कि भैया, तीर खाली चला गया। ताजा विवाद उठा है, कमलनाथ के बयान से। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने टिकट बंटवारे को लेकर कहा, “हमने जो जीतने वाली महिलाएं थीं, उनको टिकट दिया है। केवल कोटा और सजावट के लिए हम उस रास्ते में नहीं गए।” कमलनाथ से सवाल पूछा गया था कि महिलाओं की भागीदारी की बात करने वाली पार्टी ने 230 विधानसभा सीटों पर महज 25 महिलाओं को टिकट क्यों दिया है। लेकिन जवाब में कमलनाथ की जुबां से जो फूटा, उससे चुनावी मैदान में बहुत कुछ फट पड़ा।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने हल्ला बोल दिया। भाजपा को जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। शिवराज ने एक चुनावी सभा में बयान पर पलटवार करते हुए कहा, “मुझे कमलनाथजी की बात पर आश्चर्य और दुख हुआ है। ये वो भूमि है जहां माताओं, बहनों, बेटियों को पूजा जाता है। द्रौपदी का अपमान हुआ करने वाले का वंश का विनाश हो गया था। महिलाएं सजावट का सामान नहीं हैं।”

स्मृति ईरानी ने कहा कि ये महिला सशक्तीकरण के प्रति कांग्रेस के दृष्टिकोण को बताता है।

कमलनाथ ने सफाई दी है कि उनका कहने का मतलब था कि कोई टिकट महज कोटा पूरा करने या सजावट के लिए नहीं होता। जिन महिलाओं का जनाधार था, उन्हें दिया गया है। शोभा ओजा तुरंत उनके समर्थन में कूदीं और कहा, “सजावट के लिए कहा, जो एक मुहावरा है यानी नाम के लिए। इसमें ‘सामान’ शब्द भाजपा ने लगाया। भाजपा झूठ बोलने में मास्टर है।”

लेकिन, जब जंग चुनावी हो और एक-एक बयान की मापतौल से जीत के तराजू का झुकाव तय होता हो तो सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है। अब कमलनाथ के बयान का असल मतलब क्या था, वो तो वही जानें लेकिन उनके एक बयान ने भाजपा को सौगात तो दे ही दी है। मामला सजावट से निकलकर पांडव और कौरव तक जा पहुंचा है। शिवराज सिंह चौहान ने इस बयान को लेकर कांग्रेस नेताओं को कौरवों की सेना करार दे दिया है। इससे पहले कमलनाथ अपने संघ वाले बयान पर भी खूब घेरे गए।

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने शशि थरूर के बयान पर सीधा हमला बोला। शशि थरूर ने हाल ही में कहा था कि पंडित नेहरू की वजह से ही मोदी, प्रधानमंत्री बन सके क्योंकि उन्होंने ऐसा संस्थागत ढांचा खड़ा किया था जिसमें कोई भी इस उच्च पद पर पहुंच सके। मोदी ने इसका जिक्र करते हुए कहा, अगर आपके भीतर लोकतंत्र की इतनी ही परंपरा है तो एक बार बस पांच साल के लिए गांधी परिवार के बाहर किसी व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बना दें।

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