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राम मंदिर-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारूकी मामले से जुड़े मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना है कि क्या मस्जिद में नमाज पढना मुस्लिमों का अभिन्न हिस्सा है या नहीं और क्या इस मामले को बड़ी बेंच के सामने भेजा जाए या नही?

अयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन में तीखी बहस हुई। राजीव धवन ने कहा कि मस्जिद गिराने वाले हिन्दू तालिबानी थे। उनकी इस टिप्पणी पर एक वकील भड़क गये और राजीव धवन पर चिल्लाने लगे। इस पर कोर्ट ने कोर्ट के डेकोरम और शब्दों की अहमियत बताई। प्रधान न्यायाधीश ने सभी को नसीहत दी कि कोर्ट में शब्दों का प्रयोग सोच समझ कर किया जाए। इस पर सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने कहा कि वह कोर्ट की टिप्पणी से असहमत हैं। उन्होंने यह भी कहा कि असहमत होने का उनका अधिकार है। इसके बाद कोर्ट ने धवन पर चिल्लाने वाले वकील को कोर्ट से बाहर जाने को कह दिया।

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट 1994 के इस्माइल फारूकी मामले पर पुनर्विचार की मांग पर फैसला सुरक्षित रख लिया। कोर्ट अब तय करेगा कि क्या संविधान पीठ के 1994 के फैसले पर फिर से विचार करने की जरूरत है या नहीं कि कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है या नहीं है? 1994 के इस्माइल फारूकी मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच राम जन्मभूमि में यथास्थिति बरकरार रखने का निर्देश दिया था ताकि हिंदू पूजा कर सकें। बेंच ने ये भी कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और नमाज कहीं भी, यहां तक कि खुले मैदान में भी पढ़ी जा सकती है।

पिछली सुनवाई में शिया वक्फ़ बोर्ड की ओर से कहा गया था कि वह देश में सौहार्द, एकता, शांति और अखंडता के लिए अयोध्या की विवादित ज़मीन पर मुस्लिम समुदाय के हिस्से को राम मंदिर निर्माण के लिए देने के लिए तैयार है…इस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से कहा गया था कि शिया वक्फ़ बोर्ड उस चीज को दान में देने की बात कर रहा है जिस पर उसका हक ही नहीं है।

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