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सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या में बाबरी मस्जिद विध्वंस के प्रसंग में उस आपराधिक मामले में, जिसे लखनऊ उच्च न्यायालय ने तकनीकी दोषों के कारण समाप्त कर दिया था, अब, जब उक्त विध्वंस को हुए चौथाई सदी पूरी होने को है, लालकृष्ण आडवानी और उमा भारती समेत 13 अभियुक्तों के विरुद्ध पुन: निरन्तर दो वर्षों तक सुनवाई करके निर्णय देने का आदेश दिया है। उसने इसे रायबरेली की अदालत के बजाय लखनऊ की मूल अदालत से जोडऩे और सुनवाई करने वाले न्यायाधीश को फैसले तक स्थानान्तरण से मुक्त  रखने को भी कहा है। अलबत्ता, मामले में अभियुक्त रहे उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को, जिन्हें राजस्थान के राज्यपाल होने के चलते मुकदमों से संवैधानिक उन्मुक्ति हासिल है, उक्त पद पर रहने तक इससे अलग कर दिया गया है।

इस बाबत कोई दो राय नहीं हो सकती कि न्यायालय के इस आदेश के बाद हमारे वर्तमान सत्ताधीशों की राजनीतिक नैतिकताएं कसौटी पर होंगी और देखने की बात यह होगी कि संवैधानिक निष्ठा की शपथ लेने वाले इसके बाद क्या व्यवहार करते हैं। केन्द्रीय मंत्री उमा भारती, जिन्होंने पहले कहा था कि वे रामजन्मभूमि के लिए फांसी तक पर लटकने को तैयार हैं और अब कह रही हैं कि जो कुछ भी हुआ था, खुल्लमखुल्ला हुआ था, फैसले की प्रतीक्षा करेंगी या नैतिकता के नाम पर प्रधानमंत्री को इस्तीफा देकर भविष्य के निर्णय का अधिकार उन पर छोड़ेंगी। उनके उलट आडवानी और मुरली मनोहर जोशी ने तो मस्जिद विध्वंस के बाद उसकी निन्दा भी की थी।

जाहिर है कि मामला सीधा-सरल नहीं, बल्कि व्यापक और बहुआयामी है। इसमें केवल वही पक्षकार नहीं हैं, जिन्होंने यह मामला दर्ज कराया, बल्कि इससे जुड़े आन्दोलनकारी भी हैं, जो आस्थाओं के नाम पर लाठी, गोली खाने या जीने मरने के लिए तैयार हैं। लेकिन मूल प्रश्न यह है कि धर्म, आस्था और विश्वास की स्वतंत्रता, जो संविधान के मौलिक अधिकारों में है, व्यक्तिपरक है या समूहपरक? हम जानते हैं कि संगठन बनाने, चलाने और आन्दोलन करने के अधिकार भी विधिक मानदण्डों, संवैधानिक मान्यताओं और उनकी व्याख्याओं पर आधारित हैं और किसी भी संगठन को कानून के उल्लंघन का अधिकार नहीं है।

प्रश्न तो खैर यह भी है कि क्या इस आदेश या इसे लेकर की जाने वाली भावी व्यवस्था की चपेट में केवल रामजन्मभूमि के लिए आन्दोलन करने वाले कारसेवक, स्वयंसेवक और उनके अनुयायी ही हैं? उनकी यह बात मान ली जाये कि अपनी आस्था व विश्वास की रक्षा/स्थापना के लिए उन्हें अपनी जान देने और आन्दोलन चलाने का अधिकार है, तो इस्लामी आईएसआईएस की कार्रवाईयों को भी दंडनीय श्रेणी से बाहर कराना पड़ेगा और आस्थाओं के नाम पर खालिस्तान आदि के समर्थकों को भी यह अधिकार देना होगा कि वे उनके लिए आन्दोलन चला सकें।

ऐसा नहीं करना तो हम सबको खुद से पूछना चाहिए कि हम काल की सीमाओं को कितने पीछे ले जाकर अपने विश्वासों के प्रति आश्वस्त हो सकेंगे? फिर काल को पीछे की ओर ले जाना सम्भव भी है या नहीं? शासन की मान्यताएं किसी को कितनी स्वीकार्य हों और इस बाबत निर्णय का अधिकार किसे हो? लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ने अपने मताधिकार के माध्यम से यह काम जिस संसद और विधानमंडलों को सौंपा है, उनकी भी सीमाएं निर्धारित हैं। ऐसे में रामजन्मभूमि के सम्बन्ध में विचार होगा तो राम का जन्म कब, कैसे और किस स्थान पर हुआ, निर्णय के सम्बन्ध में साक्ष्य अपेक्षित होंगे। प्रसंगवश, पूछना होगा कि काशी विश्वनाथ मन्दिर और मस्जिद विवाद कब-कैसे हुआ और अब उसका नया स्वरूप क्या हो, इसका निर्णय कौन और कैसे करे, जो सबको स्वीकार्य, सहमतिपरक और समाधानकारक हो?

आस्था, विश्वास, धर्म और मान्यता को संविधान के अनुसार व्यक्तिपरक माना जायेगा तो सामूहिक आन्दोलन के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाया जायेगा? इस प्रश्न के लिए निर्णायक तो उन्हें ही मानना पड़ेगा, जिन्हें इस सम्बन्धी अधिकार सौंपे गये हैं। लेकिन कोई तर्क दे कि निर्णय प्राचीन संस्थानों द्वारा होगा तो उसे स्वीकार्यता कहां से हासिल होगी? फैसले मान्यताओं के विश्वासधारक करेंगे या संवैधानिक संस्थाएं?

आपराधिक षडय़न्त्र का यह मामला अयोध्या स्थित रामजन्मभूमि थाने के प्रभारी की आख्या पर आधारित था, जिसमें विध्वंस से लेकर आपराधिक षडय़ंत्र तक समस्त प्रकरण शामिल थे। इनकी बाबत साक्ष्य केन्द्रीय जांच ब्यूरो को उपलब्ध कराना है, जिसको पिंजरे का तोता भी कहा जाता है। अब जब पिंजरे के स्वामी और सरकार के संचालक दोनों ही एक पक्ष के हैं तो भावी दृष्टि क्या हो? लोकतांत्रिक मान्यता और लोक नैतिकता के आधार पर इसका आकलन आसान है, क्योंकि उन्हें ही संविधान से लेकर कानून तक बनाने और बदलने के अधिकार हैं। इस रूप में संसद चाहे तो कानून बनाकर इस स्थिति का समाधान कर सकती है। राज्य को किसी भी मामले को न्यायालय में वाद दायर करने, वापस लेने या किसी मामले में दी गई न्यायिक सजाओं के परिहार का अधिकार भी है ही। अलबत्ता, ऐसे निर्णय भेदभावरहित होने चाहिए।

मामले को 2 वर्ष में निपटाना बहुत कुछ कार्यपालिका की इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा। विध्वंस के लगभग 25 वर्ष बीत चुके हैं। प्रत्यक्षदर्शियों एवं साक्ष्यों पर इसका प्रभाव पड़ा ही होगा। जो अधिकारी उस वक्त ड्यूटी पर थे, उनमें से ज्यादातर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अभियुक्तों में शामिल फैजाबाद के तत्कालीन डीएम और एसएसपी में एसएसपी की मृत्यु हो चुकी है। इस बीच वे भाजपा के सांसद भी रहे थे।

बहरहाल, इस सिलसिले में जिसे हम विवाद कहते हैं, उसका नाम कुछ भी हो, वह मानसिकता और प्रवृत्तिजन्य है और उसका दोष भी अभियुक्तों तक ही सीमित नहीं है। इसलिए कुछ लोगों को दंडित करके कर्तव्यों की इतिश्री समझी जाये तो दोष तो मूलरूप से विद्यमान ही रहेगा। क्योंकि यह दोष किसी खास धर्म और विश्वास से ही नहीं, बल्कि विभिन्न मत-मतान्तरों विश्वासों से जुड़ा है। हां, यह नहीं कहा जा सकता कि हम जिन्हें पुरातनपंथी, कट्टरवादी और समय के रथचक्र को पीछे घुमाने वाला मानते हैं, वे देश की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी संख्या तो नगण्य है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थों के कारण समाधान कठिन हो रहा है।

कहना होगा कि सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से लोगों में न्यायपालिका के प्रति विश्वास की भावना का सृजन हुआ है। अब महत्वपूर्ण यह है कि इस संस्था की निर्णायक स्वतंत्रता की रक्षा कैसे की जाये, क्योंकि न्यायपालिका भी राज्य का ही अंग है। उसकी शक्ति, अधिकार, व्यवस्था और साधन सभी कुछ राज्यप्रदत्त हैं। सो उसकी स्वतंत्रता की रक्षा तभी सम्भव हो सकेगी जब समाज में उसकी निर्बाध आवश्यकता स्वीकार की जाये। स्वार्थ, मान्यता, विश्वास और भावी दिशा के सम्बन्ध में एकरूपता का अभाव इसमें बाधक बनता है और तब लोकतंत्र में निर्णय बहुमत पर ही आधारित हो जाता है, जो राजनीतिक स्वार्थ से संचालित होता है।

जहां तक आपराधिक षडय़न्त्र का सम्बन्ध है, जब राज्य द्वारा सर्वोच्च न्यायालय एवं सर्वदलीय राष्ट्रीय एकता परिषद में किये गये वादों की पूर्ति और अमल में अन्तर हो तो जाहिर है कि जो कुछ हुआ, वह कार्यपालिका की सहमति के बिना सम्भव ही नहीं था। इस लिहाज से देखें तो अभियुक्त ये तेरह ही नहीं रह जाते। इनकी संख्या और सीमा और बढ़ सकती है।

शीतला सिंह

Courtesy : http://www.enctimes.com

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