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हालिया उपचुनावों में मिली करारी हार ने बीजेपी की धार कम कर दी है। इसका फायदा सहयोगी दल उठाने में भला क्यों पीछे रहे। डीटीपी और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा से तलाक और शिवसेना के बदले रूख से एनडीए और बीजेपी खेमे में भारी बेचैनी है। वहीं बिहार में नीतीश, रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा की तिकड़ी एनडीए में सिर उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। इसके सबूत हाल के दिनों में रामविलास और नीतीश की जुगलबंदी के रूप में सामने आई है। बिहार में जारी सियासी घमासान के बीच केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने भी नीतीश कुमार की बिहार की विशेष दर्जे की मांग का समर्थन कर बीजेपी पर पड़ रहे दबाव को और बढ़ा ही दिया। इस संबंध में अपने बेटे चिराग पासवान के साथ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात की। इससे नीतीश की बात को ही बल मिला। सात जून को होने वाली मीटिंग में भी जेडीयू बीजेपी मंत्रियों के सामने यह मुद्दा उठा सकती है।

वहीं केंद्रीय मंत्री और आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा भी दो कदम आगे, तीन कदम पीछे चलकर बीजेपी के साथ-साथ नीतीश पर भी दबाव बनाने में जुटे हैं। उपचुनावों में मिली तगड़ी हार और सहयोगियों को एकजुट रखने का तनाव बीजेपी पर सबसे ज्यादा है। क्योंकि, विरोधी तो विरोधी उसके अपने ही उसके लिए मुसीबत खड़ी करने में कोई कमी नहीं करना चाहते। इसका सबूत आज पटना में सामने आया। जेडीयू नेता पवन वर्मा ने बीजेपी को बड़े भाई के बड़े दिल से जोड़ने में देरी नहीं की। यानि, नीतीश कुमार के नेतृत्व में हुई बैठक में बिहार में एनडीए के बैनर तले आम चुनाव लड़ने की बात हुई है। लब्बोलुआब ये कि नीतीश कुमार बिहार में एनडीए का चेहरा ‘बिग ब्रदर’ बने रहेंगे। सूत्रों के मुताबिक, बदलते सियासी घटनाक्रमों के बाद बीजेपी भी सीएम नीतीश कुमार के चेहरे को तरजीह देने के मूड में है। इस पर सात जून को पटना में एनडीए की मीटिंग में इस बात पर औपचारिक मुहर लग सकती है। इसमें बीजेपी के साथ ही सभी सहयोगी दलों के नेता शामिल लेंगे।

केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की हालत बिहार के एनडीए सहयोगियों में सबसे ज्यादा पतली है। क्योंकि, नीतीश के एनडीए में दोबारा आने के बाद उन्हें अभी से गठबंधन में मिलने वाली सीट की चिंता सता रही है। इसके लिए उन्होंने उपचुनाव में हार की वजह जानने के बहाने एनडीए की बैठक बुलाने और सहयोगियों के साथ बैठ कर सीटों के बंटवारे का राग छेड़ दिया है। बिहार में लोकसभा की 40 सीटे हैं। स्वाभाविक तौर पर बीजेपी और जेडीयू सीटों के सबसे बड़े दावेदार हैं। तीसरे नंबर पर एलजेपी होगी। ऐसे में सीटों का बंटवारा पेचीदा होना तय है। वहीं बीजेपी बखूबी जानती है कि, सहय़ोगी नीतीश के चेहरे से बड़ा कोई चेहरा उसके पास नहीं है। उनकी विकासात्मक छवि को देखते हुए भगवा पार्टी उन्हें नाराज करने का खतरा नहीं मोल सकती। ऐसे में बीजेपी लालू-कांग्रेस की दोस्ती को पटकनी देने के लिए खुद के लिए कुछ सीटों की बलि चढ़ा दे तो आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि, बात 2019 के चुनाव में जीत की जो है।

ब्यूरो रिपोर्ट एपीएन

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