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2018 का बजट सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। सत्र का दूसरा हिस्सा भी शुक्रवार को खत्म हो रहा है। ऐसे में ये 2000 से अब तक का सबसे छोटा बजट सत्र होगा। संसद में भले ही 24 लाख करोड़ रुपये का बजट पास हुआ हो  लेकिन इस पर कुल मिलाकर एक दिन भी चर्चा नहीं हुई। हंगामे के कारण राज्यसभा के सभापति और देश उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू काफी नाराज हुए। वेंकैया नायडू ने सभी सांसदो को कड़ी फटकार लगाई।

सांसदों ने जहां लोकसभा में बजट पर चर्चा में सिर्फ साढ़े 14 घंटे लगाए, वहीं राज्यसभा में ये आंकड़ा करीब 11 घंटे ही रहा।  इससे पहले के बजट सत्रों की बात करें तो आम तौर पर सत्र के कुल समय का 20 प्रतिशत या 33 घंटे बजट पर चर्चा में खर्च होते थे।

प्रॉडक्टविटी की बात करें तो 2018 का सत्र चौथा सबसे खराब सत्र रहा। पीआरएस लेजिस्लेटिव के डेटा पर गौर करें तो साल 2010 के शीतकालीन सत्र में प्रॉडक्टिव काम में बेहद कम समय खर्च किया गया था। वहीं लोकसभा सांसदों की ओर से 2010 के सत्र में महज 6 प्रतिशत समय का इस्तेमाल किया, हालांकि 2013 और 2016 में इसमें सुधार हुआ और 15 प्रतिशत समय का इस्तेमाल हुआ।

राज्यसभ में स्थिति और भी खराब रही। 2010 में राज्य सभा में महज 2 प्रतिशत समय का ही इस्तेमाल हुआ। इसके अलावा प्रश्न काल का इस्तेमाल भी इस सत्र में बेहद कम रहा। लोकसभा में तय समय का 16 प्रतिशत हिस्सा ही सवाल पूछने के लिए इस्तेमाल हुआ, जबकि राज्य सभा में ये आंकड़ा 5 प्रतिशत है।  प्रश्नकाल का इस्तेमाल आम तौर पर सांसदों द्वारा सरकार से सवाल पूछने के लिए होता है। संसद में बेहद काम होने के लिए पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

—ब्यूरो रिपोर्ट, एपीएन

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