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कई बार कहा गया है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा… भले ही हम और आप इस बात को मजाक समझ कर हवा में उड़ा दे लेकिन पानी पर जारी एक रिपोर्ट की माने को ऐसी संभावना बढ़ती जा रही है…रिपोर्ट के अनुसार दुनिया पानी की गंभीर समस्या की ओर बढ़ रही है… दुनिया बूंद-बूंद को तरसने वाली है… सब कुछ यूं ही चलता रहा तो दुनिया की सात अरब आबादी को प्यास बुझाने के लिए पानी नसीब नहीं होगा…

भले ही धरती 70 फीसदी पानी से घिरी है लेकिन दुनिया पानी के बीच रह कर भी पानी के तरसने वाली है…ये कह कर हम आपको डराना नहीं चाहते बल्कि ये सब हम इसलिए बता रहे कि अब भी वक्त है हम सभी को संभल जाना चाहिए… कुदरत से छेड़छाड़ बंद करें वरना जब कुदरत हिसाब करेगी तो इंसानों की स्थिति वहीं होगी जो बिन पानी मछली की होती है…

अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी वॉटरएड की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनियाभर में 84.4 करोड़ लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं, जिसमें 16.3 करोड़ लोग अकेले भारत में मौजूद हैं… रिपोर्ट्स की मानें तो आने वाले कुछ ही दिनों में दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में पानी खात्मे की कगार पर पहुंचने वाला है, इसे ‘जीरो डे’ नाम दिया गया है… हालांकि, ये खतरा सिर्फ केपटाउन पर ही नहीं है… भारत का बेंगलुरू शहर भी सूखने की कगार पर है…

यूएन की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले समय में ब्राजील के साओ पाउलो और भारत के बेंगलुरु में पानी की किल्लत का खतरा सबसे ज्यादा होगा। जहां केपटाउन और साओ पाउलो में ये खतरा सूखे की वजह से पैदा होगा, वहीं बेंगलुरु में ये परेशानी खुद इंसानों की खड़ी की गई है… बीते कुछ सालों में बिना प्लानिंग के शहरीकरण और गांवों में अतिक्रमण की वजह से बेंगलुरु के 79% तालाब खत्म हो चुके हैं… वहीं मानवनिर्मित इन्फ्रास्ट्रक्चर 1973 के 8% के आंकड़े से बढ़कर 77% हो गया है…

बीते दो दशकों में बेंगलुरु का वॉटर लेबल 10-12 मीटर से गिरकर 76-91 मीटर तक नीचे चला गया है। वहीं, बीते 30 सालों में पानी निकालने के लिए खुदे हुए कुंओं की संख्या 5 हजार से बढ़कर 4.5 लाख पहुंच गई है… बेंगलुरू किस तेजी से सूखता जा रहा है ये इसी बात से पता चलता है कि हाल ही में कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री ने कहा था कि बांध के स्तरों को देखते हुए बेंगलुरु के पास सिर्फ 60 दिन के पीने का पानी ही बचा है…

रिपोर्ट में बताया गया है कि केपटाउन की तरह 10 शहर ऐसे हैं जहां भविष्य में हालात बिगड़ सकते हैं… ये शहर हैं साओ पाउलो, बेंगलुरू, मेक्सिको सिटी, नैरोबी, कराची, काबुल, इस्तांबुल, बीजिंग, ब्यूनोस आयर्स और सना। पानी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था वॉटरएड की रिपोर्ट बताती है कि किस तरह दुनिया के लाखों लोग रोज पानी की कमी से लड़ रहे हैं… पानी के लिए लोगों को कई किलोमीटर दूर तक का सफर करना पड़ता है

‘स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स वॉटर 2018: द वॉटर गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक, युगांडा, नाइजर, मोजांबिक, भारत औऱ पाकिस्तान उन देशों में शुमार हैं जहां सबसे ज्यादा लोग ऐसे हैं जिन्हें आधे घंटे का आना-जाना किए बगैर साफ पानी नसीब नहीं हो पाता। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 16.3 करोड़ लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं जबकि पिछले साल ये आंकड़ा 6 करोड़ 30 लाख लोगों का था। आंकड़ा बढ़ने की वजह ये है कि वो लोग जिन्हें अपने घर तक पानी लाने में आधे घंटे लगते हैं, उन्हें यूएन के नियमों के मुताबिक पानी की पहुंच वाले लोगों की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाता।

इरीट्रिया, पापुआ न्यू गिनी और युगांडा ऐसे तीन देश हैं जहां घर के करीब साफ पानी की उपलब्धता सबसे कम है… युगांडा में महज 38% लोगों तक पानी की पहुंच है। पानी पर बेहतरीन काम करने वाले टॉप 4 में मोजाम्बिक शामिल है। इसके बावजूद मोजाम्बिक सबसे कम पानी की पहुंच के मामले में दुनिया के टॉप 10 देशों में शुमार है।

गरीबी-अमीरी की खाई भी पानी की उपलब्धता में अंतर पैदा कर रही है… अमीर तो पैसे के बल पर पानी हासिल कर ले रहे हैं। लेकिन गरीबों को पानी की जबर्दस्त किल्लत का सामना करना पड़ता है। नाइजर में 41% गरीबों तक ही पानी पहुंच पा रहा है, जबकि अमीरों में यह आंकड़ा 72% है। माली में 45% और 93% के साथ यह अंतर देखने को मिलता है।

ये रिपोर्ट डराने वाली है लेकिन अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो वो दिन दूर नहीं जब पानी के लिए जंग तक लड़ी जाएंगी… जिस तरह से दुनिया में पीने की पानी की किल्लत हो रही है वो एक चेतावनी है और इस चेतावनी को अनसुना नहीं किया जा सकता।

ब्यूरो रिपोर्ट एपीएन

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