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मौजूदा दौर में जलवायु परिवर्तन बड़ी समस्या है। आज इससे समूची दुनिया जूझ रही है। बाढ़, सूखा, जानलेवा बीमारियों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी इसी का नतीजा है। जलवायु रिवर्तन औसत मौसमी दशाओं के पैटर्न में ऐतिहासिक रूप से बदलाव आने को कहते हैं। जलवायु की दशाओं में यह बदलाव प्राकृतिक भी हो सकता है और मानव के क्रियाकलापों का परिणाम भी।

ग्रीनहाउस प्रभाव और भूमण्डलीय ऊष्मीकरण यानि ग्लोबल वार्मिंग को मनुष्य की क्रियाओं का परिणाम माना जा रहा है जो औद्योगिक क्रांति के बाद मनुष्य द्वारा उद्योगों से निकल रही कार्बन डाई आक्साइड जैसी गैसों के वायुमण्डल में अधिक मात्रा में बढ़ जाने का परिणाम है। जलवायु परिवर्तन के खतरों के बारे में वैज्ञानिक लगातार आगाह करते आ रहे हैं। यदि जल्द इसका समाधान निकालने में दुनिया के देश नाकाम रहे तो इसमें दो राय नहीं कि समस्त प्राणी जगत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

जलवायु परिवर्तन आज दुनिया के सामने एक बड़ी समस्या बनकर खड़ा हुआ है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक जलवायु में लगातार परिवर्तन होते रहें हैं। कभी पृथ्वी का तापमान कम हो जाता है और बर्फ की चादर बढ़ जाती है तो कभी तापमान बढ़ जाता है और बर्फ पिघलने लगती है। हालांकि ये सभी बदलाव एक लंबी प्रक्रिया के तहत होते हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों से वैश्विक जलवायु में तेजी से बदलाव हुए हैं। इस बदलाव के पीछे मनुष्य के अंधे विकास की चाहत का सबसे बड़ा हाथ है। और इस तथाकथित विकास ने पर्यावरण को पीछे धकेल दिया है।

आर्कटिक काउंसिल की हालिया रिपोर्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के चलते 2040 तक आर्कटिक सागर की बर्फ का बीस फीसदी हिस्सा पिघल जाएगा। इसके पिघलने से आर्कटिक में किसी फ्रीजर की तरह संरक्षित प्राचीन जीवाणु, विषाणु और कार्बन बाहर आ जाएँगे। इससे साढ़े तीन करोड़ लोग सीधे-सीधे प्रभावित होंगे। वहीं बर्फ के पिघलने के साथ ही समंदर में पानी का स्तर भी बढ़ेगा जो तटवर्ती शहरों की जमीन और सड़कों कों अपनी चपेट में लेकर तबाह कर देगा। इमारतों के धराशायी होने का खतरा भी बढ़ेगा। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से रोजगार के लाखों अवसर भी घट जाएंगे। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मत्स्य उद्योग और पर्यटन उद्योग पर पड़ेगा। मत्स्य उद्योग पर विश्व के करीब 40 करोड़ लोग आश्रित हैं।

दुनिया में कुल 15 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर 45 करोड़ टन चावल का उत्पादन होता है जिसमें विश्व के कुल उत्पादन का 20 फीसदी चावल भारत में होता है। लेकिन बढ़ते तापमान की वजह से आने-वाले दिनों में हम चावल के दाने-दाने को मोहताज हो जाएँगे। ह्यूलेट फाउंडेशन के मुताबिक 2030 में भारतीय उपमहाद्वीप का तापमान काफी बढ़ जाएगा। इस वजह से धान की फसल उगाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

बीते दिनों केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़े हुए तापमान का दबाव दूध देने वाले पशुओं पर काफी नुकसानदेह हो सकता है। उन्होंने स्वीकार किया कि देश के विभिन्न हिस्सों में जलवायु परिवर्तन के चलते दुग्ध उत्पादन में 1.8 मिलियन टन की कमी आई है।

वह समय भी जल्द आ सकता है जब ज्यादातर लोगों को पीने के लिये साफ पानी और खाने के लिये ताजा भोजन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो सके। ऐसा अनुमान है कि 2050 के बाद फसलों को और ज्यादा नुकसान पहुँचेगा, तब तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9 अरब तक पहुँचने का अनुमान है।

ऐशोआराम के साधन बढ़ने से आज विश्व के सभी राष्ट्रों में ऊर्जा की जरूरत बढ़ती जा रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने के संयत्रों, उद्योगों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी से वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई के चलते कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है।

ऐसे में जरूरी है कि विद्युत ऊर्जा का किफायत से उपयोग किया जाये और बिजली उत्पादन के लिये कोयले की जगह प्राकृतिक गैस को ईंधन के रूप में पावर प्लांट में उपयोग किया जाए जिससे परमाणु भट्ठी की गर्मी को सीमित और कोयले की राख को कम किया जा सकेगा।

ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोतों जैसे पवन ऊर्जा, हाइड्रोइलेक्ट्रिक ऊर्जा और सौर ऊर्जा का उपयोग किया जाए

वस्तुओं को रिसाइकिल करने की प्रक्रिया शुरू की जाए क्योंकि किसी उत्पाद को रिसाइकिल करके उसके उत्पादन में किसी नये सिरे से उत्पादन करने की अपेक्षा कम ऊर्जा खर्च होती है

मीथेन, क्लोरोफ्लोरो कार्बन, सोडियम डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी गैसों की मात्रा को नियंत्रित करना होगा।

लोगों के द्वारा कार पूलिंग या सार्वजनिक वाहन का उपयोग किया जाए और ज्यादा पुराने हो गये वाहनों का प्रयोग बंद कर दिया जाए।

सीएफएल या एलईडी बल्ब का ही उपयोग किया जाए

अधिक स्टार वाले उपकरणों का उपयोग किया जाए जिससे ऊर्जा की बचत हो सके।

टेलीविजन और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को उपयोग के बाद पूरी तरह बंद कर दिया जाए, उन्हें स्टैंडबाई मोड पर न छोड़ा जाए

खाना पकाने के लिये कुकिंग गैस या सोलर कुकिंग का प्रयोग किया जाए

अगर हम अब भी नहीं चेते तो प्रकृति हमें कभी माफ नहीं करेगी। अब समय आ गया है कि हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें और अति भौतिकवादी होने से बचें। पर्यावरणीय दृष्टि से अनुकूल तकनीकी विकास, जैव उर्वरक, जैव कीटनाशकों के उपयोग और बायो ईंधन को तरजीह दें। कम-से-कम पांच पेड़ जरूर लगाएँ तभी हम किसी हद तक इस समस्या के प्रभाव को कम करने में कामयाब हो सकते हैं। नहीं तो आने वाली तबाही को रोक पाना आसान नहीं होगा।

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