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कहते हैं कि अगर रणनीति अच्छी हो तो मेहनत भी रंग लाती है, अन्यथा लाख मेहनत करने पर भी परिणाम शून्य ही नजर आता है। कुछ ऐसा ही हाल आज कांग्रेस का है जहां लाख कोशिशों के बावजूद भी उसे असफलता का ही मुंह देखना पड़ रहा है। हाल में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद जहां अपनी गलतियों से उसने गोवा और मणिपुर की सत्ता को खो दिया वहीं अपनी खराब रणनीति के चलते उसने बिहार में भी भाजपा को पैर पसारने का मौका दे दिया। हाल यह हुआ कि अब एनडीए देश के 18 राज्यों पर काबिज है जहां बीजेपी अकेले 13 राज्यों में राज कर रही है।

एक समय था जब कांग्रेस पूरे देश में दो-तिहाई राज्यों पर काबिज थी लेकिन समय के साथ भाजपा ने पूरा पासा ही पलट दिया। हैरानी की बात यह है कि वर्तमान और भविष्य में भी पार्टी की कोई ठोस नीति नहीं दिख रही जिससे पार्टी मोदीभक्तों को राहुलभक्त बनवा सके। पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी खुद भी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभर नहीं पाए हैं जो मोदी को टक्कर दे सके। ऊपर से भाजपा में चाणक्य उपाधि से प्रसिद्ध अमित शाह की रणनीति दिनोंदिन अपना रंग दिखा रही है। हाल ये है कि चुनाव दर चुनाव भाजपा के रणनीति में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाना इसी परिवर्तन का हिस्सा था।

वहीं वर्तमान परिदृश्य में भाजपा की असफलता को कांग्रेस भुनाने में भी नाकाम रही है, चाहे वह नोटबंदी हो या आत्महत्या करते किसानों का मसला। हाल ही में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी किसानों की समस्याओं को लेकर लखनऊ पहुंचे। लखनऊ में सड़क निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई जमीन का किसान उचित मुआवजा मांग रहे हैं। किंतु राहुल गांधी एनएचएआई के अधिकारियों से मिलकर, ज्ञापन सौंपकर दिल्ली आ गए। उन्होंने न कोई सभा की और न ही किसानों से मिले। इसी तरह किसान आंदोलन के समय भी वो सही समय पर नदारद रहे। उनकी इसी तरह की लापरवाही का नतीजा है कि भाजपा के नेता उनकी चुटकी लेते रहते हैं।

समस्या तब और बढ़ जाती है जब राहुल गांधी के सिपहसालार भी कांग्रेस की डूबती नाव को बचा नहीं पा रहे। गोवा में सबसे ज्यादा सीट पाकर भी कांग्रेस वहां सरकार बनाने में नाकामयाब रही। सुनने में आया कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह गोवा में समुद्र किनारे लहरों का मजा लेते रहे और बीजेपी ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। इस समय गुजरात में कांग्रेस वैसे भी एक तरफ से दूसरे तरफ भाग रही है कि कहीं भाजपा की नजर उसके विधायकों पर न पड़ जाए।

ऐसे में कांग्रेस को किसी ‘श्री कृष्ण’ की आवश्यकता है जो उसके लिए रणनीति तैयार कर सके। जिस तरह महाभारत में श्री कृष्ण पांडवों के सलाहकार के रूप में रहते हुए पूरे महाभारत का तानाबाना रच रहे थे। ठीक उसी तरह कांग्रेस को भी किसी ‘श्री कृष्ण’ की आवश्यकता है जो हाल में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनाव का तानाबाना बुनकर उसे जीत दिला सके।

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