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दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध है लेकिन उससे भी बड़ा अपराध है-‘दहेज उत्पीड़न’। किसी भी महिला के पति द्वारा उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करना जुल्म है। पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लिए महिला को उत्पीड़ित करने के जुल्म में ‘भारतीय दंड संहिता’ की धारा 498 के तहत महिला के पति और उसके रिश्तेदारों को तुरंत गिरफ्तार करने का प्रावधान था। लेकिन इस प्रावधान पर बीते अक्टूबर में डिवीजन बेंच द्वारा रोक लगा दी गई थी।

लेकिन अब 29 नवंबर को हुई सुनवाई में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने दहेज उत्पीड़न के मामलों में डिवीजन बेंच के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा-कि कानून के रहते अलग गाइडलाइन कैसे बनाई जा सकती है? इस मामले पर जनवरी के तीसरे हफ्ते में फिर से सुनवाई की जाएगी।
क्या था डिवीजन बेंच का फैसला-

बता दे कि इससे पहले 13 अक्टूबर को डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी और पहले की प्रकिया से अलग एक गाइड लाइन बनाई थी। लेकिन डिविजन बेंच के इस फैसलें का सुप्रीम कोर्ट विरोध कर रही है। साथ ही दुबारा सुनवाई करने के बाद ही अंतिम फैसला लेने का एलान कर रही है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए महिलाओं पर हो रहे दहेज उत्पीड़न के मामलों को रोकने के लिए बनाई गई है, लेकिन इस धारा का दुरपयोग भी बहुत बढ़ गया है। कई मामलों में महिलाएं आपसी रंजिश के चलते अपने पति पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाकर फंसा देती थी। जिससे बेगुनाह आदमियों को सजा काटनी पड़ती थी, जो कि सरासर गलत है।

पुरुष समाज के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा था-कि हर जिले में डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विस अथॉरिटी द्वारा परिवार कल्याण कमेटी का गठन किया जाएगा। अगर पुलिस को दहेज उत्पीड़न की कोई भी शिकायत मिलती है तो उस मामलें की पड़ताल पुलिस से भी पहले इस कमेटी द्वारा की जाएगी। कमेटी को दोनों पक्षकारों से बात करके एक महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी । जब तक कमेटी द्वारा रिपोर्ट पेश नहीं की जाती है, तब तक किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की जायेगी। रिपोर्ट मिलने के बाद फैसला जांच अधिकारी या मजिस्ट्रेट लेगा।
अगर मजिस्ट्रेट की जांच के दौरान ये बात साबित होती है कि पति आरोपी है और उसने दहेज के लिए पत्नी को प्रताड़ित किया है, तो पति और संबंधित रिश्तेदारों की गिरफ्तारी की जायेगी अन्यथा नहीं।

बेंच के फैसले से महिलाओं के अधिकारों का हनन-

डिवीजन बेंच के इस फैसले के बाद से कई सामाजिक संगठनों ने इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के खिलाफ बताते हुए अर्जी दायर की थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लगातार जारी है। लेकिन अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जनवरी के तीसरे हफ्ते में सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट में सामाजिक संगठनों द्वारा दाखिल याचिका में लिखा गया है कि डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए इस आदेश से दहेज उत्पीड़न रोक कानून का असर बेअसर हो जाएगा। साथ ही महिलाओं पर अत्याचार का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। दाखिल याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच कर रही है।

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