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छत्तीसगढ़ की रमण सिंह सरकार सूबे में सर्व शिक्षा अभियान के जरिए शिक्षा का अलख जगाने का दावा करती है। लेकिन क्या सरकार जो दावा करती है वो धरातल पर पहुंच पाई है। क्या छत्तीसगढ़ में बच्चों को शिक्षा का अधिकार मिल पाया है। इसी की तलाश करते हुए हम बलौदा बाजार जिले के कई सरकारी स्कूलों का जायजा लिए।

शिक्षा का सच जानने के लिए सबसे पहले हम कसडोल ब्लॉक के बलार नवागांव प्राथमिक स्कूल पहुंचे। बलार नवागांव प्राथमिक स्कूल में क्लास 1 से 5 वी तक की पढ़ाई हो रही है । जब हम यहां पहुंचे तो बच्चे क्लास रूम में पढ़ते दिखे। लेकिन जब हमारी नजर क्लास रूम की छत पर पड़ी तो स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं का सच सामने आ गया। स्कूल की छत काफी जजर्र हो चुकी है और इसी स्थिति में बच्चे जान जोखिम में डाल कर अपना भविष्य गढ़ने को मजबूर है।

लेकिन ये तो स्कूल की दुर्दशा की पहली झलक थी जब हम स्कूल के दूसरे क्लास में गए तो वहां स्थिति बेहद दयनीय थी। छत पूरी तरह से जर्जर है और बरसात के मौसम के चलते स्कूल की छत से लगातार पानी का रिसाव हो रहा है। छत से टपकने वाली पानी की वजह से स्कूल के क्लास रूम में पानी भर गया है। हाल ये है कि बारिश होने पर स्कूल में छुट्टी कर दी जाती है या सभी बच्चों को एक ही क्लास में बैठा दिया जाता है। बलार नवागांव के इस स्कूल में कुछ क्लास तो इतनी जर्जर हो चुकी हैं कि कभी भी भरभरा कर गिर सकती है।

बलार नवागांव स्कूल के बाद हम कसडोल ब्लॉक के ही चनहाट गांव के प्राथमिक स्कूल पहुंचे। लेकिन ये क्या, स्कूल तो बंद था, स्कूल में ताला लगा हुआ था। आगे बढ़े तो स्कूल के बच्चे गांव के एक ग्रामीण के घर के बरामदे में पढ़ते नजर आए, कहने को तो स्कूल की इमारत है लेकिन वो इस कदर जर्जर हो चुकी है कि यहां बच्चों का पढ़ाना सुरक्षित नहीं। पता नहीं कब जर्जर छत सिर पर गिर जाए। ऐसे में बच्चों को गांव के एक घर के बरामदे में बैठ कर पढ़ाई करनी पड़ रही है, इस स्कूल में 31 बच्चे हैं लेकिन वो भी एक ही शिक्षक के भरोसे, अगर एकलौते शिक्षक को किसी काम से बाहर जाना पड़ा तो स्कूल की छुट्टी।

यहां पढ़ने वाले बच्चों की पढ़ाई का सुध लेने वाला कोई नहीं, यहां के बच्चों को अभी तक ना तो किताबें मिल पाई है और ना ही स्कूल ड्रेस। पूरी शिक्षा व्यवस्था से बच्चे बेहद परेशान हैं और वो सरकार से मांग कर रहे हैं कि वो जल्द से जल्द उनके स्कूल की नई बिल्डिंग बनवा दे

स्कूल की जर्जर स्थिति के बारे में यहां के एक मात्र शिक्षक और प्रिंसपल ने शासन-प्रशासन को कई बार जानकारी दी, कई पत्र लिखे। लेकिन इन पत्रों का शिक्षा विभाग और स्थानीय प्रशासन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। शायद सरकार स्कूल में किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है।

छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार के कसडोल ब्लॉक में शिक्षा के अधिकार की मुकम्मल तस्वीर को तलाशते हुए हम धमलपुरा गांव के आश्रित गांव तेन्दुचुआ में पहुंचे। लेकिन हमें तो यहां स्कूल के रूप में एक खंडहरनुमा अर्ध निर्मित इमारत दिखी। पूछने पर पता चला कि ये स्कूल भवन 8 सालों से अधूरा पड़ा है, आज से 8 साल पहले इस प्राथमिक स्कूल का निर्माण शुरू हुआ था लेकिन बजट के आभाव में काम रूक गया। आज इस अधूरे बने स्कूल में झाड़ियां उग आई है, पिछले 8 सालों से एक बेहतर स्कूल की आस लगाए बच्चों के साथ इससे क्रूर मजाक क्या होगा। स्कूल की इमारत के अधूरी रहने के कारण बच्चों को वन विभाग के सामुदायिक भवन में एक साथ बैठाकर पढ़ाई करानी पड़ रही है।  यहां के शिक्षकों ने स्थानीय विधायक सनम जांगड़े को बार बार स्कूल भवन के अधूरा होने की जानकारी दी लेकिन इसके बाद भी भवन का निर्माण पूरा नहीं हो सका है।

छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा के प्रति शिक्षा विभाग और सरकार की उदासीनता को दिखाती है। बलौदाबाजार जिले के बदहाल स्कूल जिले में शिक्षा तस्वीरों को बयां करने के लिए काफी है, जिले के ना केवल स्कूल भवन जजर्र है बल्कि जिले के स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरस रहे है, बलौदाबाजार जिले में 3000 शिक्षकों की कमी है इससे आप अंदाजा लगा सकते है, जहां शिक्षकों की इतनी कमी हो वहां पढ़ाई का स्तर कैसा हो सकता है, शिक्षा के लिए यहां के नौनिहालों को हर कदम पर जिले की दम तोड़ती शिक्षा व्यवस्था से जूझना आज सबसे बड़ी चुनौती है।

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