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देश की सियासत में बीजेपी को मजबूत कर विपक्ष को पटखनी देते आ रहे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में इन दिनों अंतरकलह की खबरे सामने आ रही हैं। सुरेश भैय्याजी जोशी के एक बार फिर संघ के सरकार्यवाह बनाए जाने से गुटबाजी शुरू होने की खबरें मिल रही हैं। माना जा रहा है कि संघ का एक धड़ा भैयाजी जोशी के सरकार्यवाह बनने से खुश नहीं है। वो दत्रात्रेय होसबोले को सरकार्यवाह के रूप में देखना चाहता था। कहा जा रहा है कि संघ के चुनाव में पहली बार लॉबिंग देखने को मिली। इससे संघ कोर कमिटी का एक वर्ग नाराज भी हो गया और होसबोले की जगह दोबारा भैय्याजी जोशी को चुना गया। अब वे 2021 तक सरकार्यवाह रहेंगे।

हालांकि, सरकार्यवाह चुनाव के पहले भैय्याजी जोशी ने उम्र का हवाला देते हुए चौथी बार सरकार्यवाह बनने की इच्छा से इनकार कर दिया था। ऐसे में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया था कि 63 वर्षीय दत्रात्रेय होसबोले उनकी जगह लेंगे। दरअसल इसके दो कारण माने जा रहे थे। पहला तो यह कि होसबोले, पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यश अमित शाह के करीबी हैं और दूसरा कारण यह कि आने वाले समय में कर्नाटक चुनाव हैं और होसबोले कर्नाटक से ताल्लुक़ रखते हैं। ऐसे में वो कर्नाटक में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

संघ सूत्रों का एक तर्क यह भी है कि होसबोले को सरकार्यवाह बनवाकर प्रधानमंत्री मोदी आरएसएस पर भी अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहते थे। इससे संघ के एक धड़े में यह धारणा भी बनी कि होसबोले सरकार्यवाह बनते हैं तो आरएसएस पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थक तबका हावी हो जाएगा। इससे बीजेपी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में संघ कमजोर पड़ने लगेगा। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सरकार्यवाह के पद पर दत्तात्रेय होसबोले को लाने में कामयाब होते तो टिकट और मंत्रीपद बंटवारे में संघ के होने वाले हस्तक्षेप पर असर पड़ता। साथ ही संघ के कार्यकर्ताओं का इस्तेमाल पूर्ण रूप से राजनीतिक गठजोड़ करने में हो सकता था।

दत्तात्रेय होसबोले संघ कोर कमिटी के ऐसे पहले शख्स हैं जिनके सार्वजनिक जीवन की शुरूआत संघ प्रचारक बनने से पहले ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानि एबीवीपी से हुई थी। वे एबीवीपी में ही आरएसएस की तरफ से दो दशक तक संगठन महामंत्री भी रहे। उन्होंने पूरी तरह अपने आप को आरएसएस की गतिविधियों में लगाया। बीजेपी में आला नेताओं तक पहुंच रखने का उन्हें यह फायदा मिला कि वे सीधे-सीधे संघ की कोर कमिटी में शामिल हो गए।

संघ में वैसे तो सबसे बड़ा पद सरसंघचालक का होता है जिस पद पर अभी मोहन भागवत हैं। आरएसएस के संविधान के अनुसार, उन्हें मार्गदर्शक-पथप्रदर्शक का दर्ज़ा मिला है, इसलिए वे संघ की रोजमर्रा की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका नहीं निभाते। ऐसे में उनके मार्गदर्शन में संघ का पूरा कामकाज सरकार्यवाह और उनके साथ चार सह-सरकार्यवाह ही देखते हैं।

ब्यूरो रिपोर्ट, एपीएन

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