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तमाम मामलों में सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां केंद्र सरकार को रास नहीं आ रही हैं। अब केंद्र सरकार ने कहा है कि भारत जैसी कई समस्याओं वाले देश में किसी एक विषय पर सुनवाई करते हुए कोर्ट को पूरी सरकार पर ही सवाल उठाने से बचना चाहिए।

जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियों से तिलमिलाई केंद्र सरकार ने सलाह दी है कि अदालतें हर मुद्दे पर सरकार की आलोचना करने से परहेज करें। सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने बेंच की टिप्पणियों को लेकर अखबारों की सुर्खियों के हवाले से कहा कि ये जरूरी नहीं है कि जज को हर समस्या के हर पहलू की जानकारी हो। भारत जैसे विशाल देश में अनगिनत समस्याएं हैं। गरीबी, अशिक्षा, जानकारी का अभाव जैसे कई गम्भीर मुद्दे हैं और सरकार को सबसे पहले उन्हें देखना है जो हर रोज 100 रुपये भी कमा नहीं पाते। अटॉर्नी जनरल ने कोर्ट से आग्रह किया कि कोर्ट सरकार के बेहतर काम को भी देखे। ऐसा नहीं है कि सरकार कुछ कर ही नहीं रही है।

अटॉर्नी जनरल ने कहा कि कोर्ट किसी जनहित याचिका पर आदेश पास करता है, तो कई बार ऐसे आदेशों के अपने प्रतिकूल असर होते हैं। उन्होंने कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम में लाइसेंस रद्द करने के फैसले ने बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश को हतोत्साहित किया। इसी तरह हाई वे के पास शराब की दुकानों के हटाने से काफी आर्थिक नुकसान हुआ, लोगों को अपनी आजीविका छोड़नी पड़ी। इसलिये मेरी राय में कोर्ट के फैसलों में इस बात का ध्यान रखा जाए कि फैसले का सरकार के बजट या फिर समाज के दूसरे लोगों पर क्या असर होगा।

अटॉर्नी जनरल की इस सलाह पर जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा कि हम सरकार की आलोचना नहीं कर रहे हैं, हम भी इस देश के नागरिक हैं और समस्याओं को जानते हैं। हम सिर्फ लोगों के अधिकारों की बात कर रहे हैं। कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 21 की अनदेखी भी तो नहीं कर सकते हैं। बहुत से काम कोर्ट के आदेशों के चलते हुए हैं। उन्होंने कहा कि बेहतर होगा कि आप अपने अधिकारियों से कहें कि वह संसद के बनाये कानूनों का पालन करें। आम जनता के हितों से जुड़े तमाम मामलों में कोर्ट के फैसलों में अकसर ही सरकार कटघरे में खड़ी दिखी है। ऐसे आदेश यह भी दर्शाते हैं कि सरकार अपना काम ठीक से नहीं कर रही है और तभी अदालत को दखल देना पड़ता है।

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