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देश की निचली अदालतों में जजों की कमी और आधारभूत ढांचे के अभाव में करोड़ों केस लंबित पड़े हुए हैं और देश के हाईकोर्ट में भी लाखों मामले इसी वजह से निपटारे का इंतजार कर रहे हैं। देश और एशिया के सबसे बड़े हाईकोर्ट इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी हाल यही है यहां कुल जजों की स्वीकृत संख्या 160 है लेकिन इस व्क्त ये घटकर 90 रह गई है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी और लगातार हो रही सेवा निवृत्ति मानी जा रही है। हालांकि इसी साल फरवरी में हाई कोर्ट कॉलेजियम ने 33 वकीलों के नाम हाईकोर्ट में जजों के तौर पर नियुक्ति के लिए भेजे थे। इसके बाद में 15 जनपद न्यायाधीशों के नाम भी भेजे गए यानी कुल 48 नाम नियुक्ति के लिए सरकार और सुप्रीम कोर्ट के पास विचाराधीन हैं। खबरों के अनुसार इनमें से सिर्फ 24 नामों को ही केंद्र सरकार ने नियुक्ति के लिए उपयुक्त पाया है और अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि कितने नाम  नियुक्ति के लिए सरकार को भेजे जाएं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इतिहास में इस साल पहली बार हुआ था जब जजों की कुल संख्या सैकड़ा पार कर 108 तक पहुंची लेकिन जजों के लगातार सेवानिवृत्त होने के चलते ये घटकर अगस्त में 90 पर आ टिकी है। अभी दिसम्बर तक 8 न्यायाधीश और सेवानिवृत्त होंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट में जजों के कुल 160  पद हैं। इस समय 64 स्थायी और 26 अस्थायी यानी कुल 90 न्यायाधीश ही कार्यरत हैं। जबकि 70 जजों के पद खाली हैं। अगर लंबित मामलों की बात करें तो एक फरवरी 2018 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन मुकदमो की संख्या लगभग 9 लाख थी जिसमें से करीब 7 लाख पांच हजार इलाहाबाद और 2 लाख 5 हजार केस लखनऊ पीठ में विचाराधीन थे।

जजों की नियुक्ति और सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति दोनों ही मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक तरह से उपेक्षा हुई है। हाईकोर्ट में जजों की स्वीकृत संख्या 160 के आधार पर इलाहाबाद से 4  सुप्रीम कोर्ट जज और 3 हाईकोर्ट चीफ जस्टिस नियुक्त होने चाहिए लेकिन जस्टिस विनीत सरन के शपथ लेने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में दो  और एक हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस सहित ये संख्या कुल 3 ही होगी।

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