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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। शुक्रवार को दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग करने वाली याचिका को खारिज करते हुए दो जजों की बेंच ने कहा कि यह मुद्दा पहले ही संवैधानिक बेंच को सौंपा जा चुका है और वह यह स्पष्ट कर चुका है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। दरअसल, 2014 में दिल्ली की सत्ता में आम आदमी पार्टी की सरकार आने के बाद राजधानी को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच संघर्ष चल रहा है।

इसी साल 4 जुलाई को हुई थी सुनवाई

इससे पहले इसी साल 4 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कहा था कि दे देश में लोकतांत्रिक मूल्‍य ही सबसे बड़ा है। चुनी हुई सरकार जनता के लिए जवाबदेह है। लिहाजा अधिकारों में संतुलन जरूरी है। संविधान का सम्‍मान करना चाहिए, हम इससे अलग नहीं हैं। हमारी संसदीय प्रणाली है, कैबिनेट संसद के प्रति जवाबदेह है। संघीय ढांचे में राज्यों को भी स्वतंत्रता है। केंद्र और राज्‍यों को मिलकर काम करना चाहिए। संघीय ढांचे में राज्यों को भी स्वतंत्रता है। इस कारण कैबिनेट के फैसले को लटकाना ठीक नहीं, विवाद हों तो राष्‍ट्रपति के पास जाना उचित है। इसलिए एलजी-कैबिनेट के बीच मतभेद की स्थिति में राष्‍ट्रपति के पास जाना चाहिए।

संविधान पीठ ने पूर्ण राज्य का दर्जा देने से किया इनकार

इसके साथ ही पांच सदस्‍यीय संविधान पीठ में से तीन जजों ने कहा था कि दिल्‍ली को पूर्ण राज्‍य का दर्जा नहीं दिया जा सकता। पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस सीकरी ने इस आशय का फैसला सुनाया। उल्‍लेखनीय है कि पांच सदस्‍यीय इस संवैधानिक पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के साथ जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे।

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