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“आदर्श चुनाव आचार संहिता” इस पंक्ति में “आदर्श” शब्द सुनने में जितना आदर्श लगता है, असल में वो उतना आदर्श होता नहीं है। ये हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि देश में चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी रुप से संपन्न कराने के लिए निर्वाचन आयोग का गठन तो कर दिया गया, उसे शक्तियां भी दे दी गईं। लेकिन हमारा निर्वाचन आयोग शायद अपनी इन शक्तियों को भूल बैठा है। ठीक वैसे ही, जैसे  पवनसुत हनुमान के बारे में कहा जाता है कि उन्हें अपनी शक्ति का एहसास नहीं था।  लेकिन स्मरण कराए जाने पर, उन्हें अपनी विशाल क्षमता का पता चल जाता था।

हमारा निर्वाचन आयोग इस मामले में तो खुश-किस्तम है, उसे अपनी ताकत का एहसास भी है और उसका इस्तेमाल करने की आजादी भी, लेकिन पता नहीं क्या वजह है, आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के सामने हमारा चुनाव आयोग, असहाय नजर आता है? ये किसी एक चुनाव की बात होती तो थोड़ा धैर्य रखा जा सकता था लेकिन, अब ये हर चुनाव की कहानी बन चुकी है।

देश की दो सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के नेता, जिनमें दो संवैधानिक पदों पर आसीन हैं। उन पर इलेक्शन कोड ऑफ कंडक्ट के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगा है। किसी को नोटिस जारी किया गया, तो किसी की शिकायत महामहिम राष्ट्रपति से किए जाने की बात सुनी जा रही है, लेकिन अफसोस, कार्रवाई का भरोसा देने वाला कोई नहीं है।

ऐसे में सवाल इस बात को लेकर उठते हैं कि, आखिर क्या फायदा ऐसी पारदर्शी व्यवस्था की डुगडुगी पीटने का जब हमारे नीति-नियंताओं ने तय कर ही लिया है, कि उनका पेशा, देश की अवाम की आंखों में धूल झोंकने का है, तो झोंकते रहिए धूल…क्या फर्क पड़ता है, आंख खुली है या बंद. आपका काम है धूल झोंकना…तो झोंकते रहिए।

-अक्षय सिंह गौर

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