Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

आज हम आपका ध्यान आकर्षित कराना चाहते हैं, राजनीति में हावी होते वंशवाद की ओर…! अगर इस विषय पर आप की दिलचस्पी है, तो आप इस लेख पर अपना समय बर्बाद कर सकते हैं, अन्यथा, इग्नोर करने का विकल्प खुला हुआ है। खैर…अब सीधा मुद्दे पर आते हैं।

दरअसल, राजनीति में वंशवाद की बहस पुरानी है और शायद आज, ज्यादातर देशों की यही कहानी है। हमारा देश भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश की आजादी के बाद लोगों को लगा कि, राजशाही के खात्मे के साथ अब लोकशाही स्थापित हो जाएगी, लेकिन अफसोस, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत, इस बीमारी की जंजीरों से आज भी जकड़ा हुआ है।

वंशवाद का विरोध करने वाली लगभग सभी पार्टियां, वंशवाद के मकड़जाल में इस कदर उलझी हुई हैं, कि इस रोग के छुटकारा मुमकिन नहीं लगता, राजनीति में वंशवाद, अपनी जड़े इतनी गहरी बना चुका है कि इससे बाहर निकलना, अगर असंभव नहीं है, तो इतना आसान भी नहीं, उत्तराधिकारी की योग्यता पर अंदेशा होने के बावजूद, उसे ताज पहनाने में कोई कोर-कसर छोड़ी नहीं जाती। भारत में वंशवाद की परंपरा,  उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी पार्टियों में घुल चुकी है।

चाहें नेहरू-गांधी परिवार हो, लालू-मुलायम का कुनबा हो…अब्दुल्ला परिवार हो या शिवसेना और अकाली दल वगैरह-वगैरह कोई भी दल हो, वंशवाद के इन आरोपों से बचा नहीं है। वंशवाद की दुहाई देने वाली बीजेपी पर भी परिवारवाद हावी है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

इसलिए, जो वंशवाद देश को दीमक की तरह खोखला करता जा रहा है, उससे मुक्ति पाने की आस रखना, ठीक वैसे ही होगा जैसे…”गंजे को कंघा बेचना” फिर भी देश की जनता के हाथ में ये मौका 5 साल में एक बार आता है। लेकिन…फिर ये सोच के मन में सवाल उठता है कि,  हमारे सभी राजनैतिक दलों की हालत तो लगभग “हमाम” जैसी है, इसलिए अफसोस, इस विकल्प को नकार ही दीजिए तो अच्छा।

-अक्षय सिंह गौर

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.