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अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी देश के सबसे बड़े क्षेत्रीय राजनीतिक समूह का हिस्सा बनने के लिए कमर कस रही है। आगामी लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में बनर्जी को देश की चुनावी  राजनीति में एक बड़ी ताकत के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने केंद्र  में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए  क्षेत्रीय पार्टियों को एकीकृत करने के प्रयासों के तहत एक संघीय मोर्चा  के गठन का आइडिया सामने रखा है।

बनर्जी आम चुनाव के बाद केंद्र में बड़ी भूमिका के लिए दृढ-संकल्पित है तथा इसी मकसद से लोकसभा में पार्टी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के वास्ते अपने 34 सांसदों के पैकेज में फेरबदल भी कर सकती है। तृणमूल कांग्रेस चाहती है कि सुश्री बनर्जी अगर प्रधानमंत्री न बनी तो भाजपा-विरोधी सरकार के किंगमेकर के रूप में सामने आये और इसके लिए यह मानकर  चल रही है कि लोकसभा में पार्टी की पर्याप्त सीटें हों।

एक दूरदर्शी और प्रभावशाली नेता के साथ ही पश्चिम बंगाल में ‘बदलाव की  प्रतीक’ बनर्जी को लेकर एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि राज्य में  उनके कद का कोई और नेता है भी नहीं। अपने करिश्मे, ऊर्जा और राजनतिक कुशाग्रता की बदौलत वह देश के बड़े नेताओं में शुमार है। वर्ष 2011 में  पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के 34 साल की सत्ता को निस्तेनाबूद करने  का इतिहास बनाने के साथ ही 2014 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 34 सीटें  जीतकर तथा 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल कर दूसरी  बार मुख्यमंत्री बननेे की उपलब्धि के साथ ही उन्होंने अपने को एक राष्ट्रीय  नेता के रूप में स्थापित किया है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री  एन चंद्रबाबू नायडू  और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला  के साथ चर्चा और दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल के आवास पर मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल के धरने का समर्थन कर सुश्री बनर्जी ने अपनी ‘राष्ट्रीय  छवि’ को प्रोजेक्ट करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ीं। इस बीच सुश्री बनर्जी ने आगामी 19 जनवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान  में एक विशाल रैली का आह्वान किया है और विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दलों के  नेताओं को आमंत्रित किया है। आसन्न आम चुनाव के मद्देनजर यह जो विपक्षी  एकता प्रदर्शित होगी, वह देश के लिए एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ होगा।

तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता के मुताबिक पार्टी ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव, बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और द्रमुक नेता एम के स्टालिन को भी रैली के लिए आमंत्रित किया है।

दूसरी  तरफ भाजपा भी पीछे नहीं है और वह दो पूर्वी राज्यों पश्चिम बंगाल और ओडिशा  में सत्ता के लिए नजरें गड़ाए हुए है जहां वर्तमान में भाजपा की क्रमश: दो  और एक लोकसभा सीट है। हाल में पश्चिम बंगाल में संपन्न पंचायत चुनावों में  भाजपा ने अपनी स्थिति में काफी सुधार किया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि उनकी पार्टी का सुनहारा  दौर तभी शुरू होगा, जब उसे पश्चिम बंगाल और ओडिशा में जीत हासिल होगी और  2019 में वह श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत के साथ दोबारा  सत्ता में आयेगी। श्री शाह ने इससे पहले दावा भी किया है कि भाजपा पश्चिम  बंगाल में 22 लोकसभा सीटें जीतेगी।

साभार, ईएनसी टाईम्स

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