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सोमवार (18 दिसंबर) को जस्टिस स्वतंत्रण कुमार की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की  बेंच ने शीला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर को नोटिस जारी करने का फैसला किया।  साथ ही ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश के क्रियानवयन के संबंध में दाखिल एक आवेदन के तहत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा की ओर से पेश होने वाले वकील और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी नोटिस जारी करने का फैसला किया। मामले की अगली सुनवाई की 25 जनवरी, 2018 को होगी।

ट्रिब्यूनल में मामला ठोस कचरे और बायो-मेडिकल कचरे के प्रबंधन को लेकर है। बेंच ने पिछली सुनवाई में स्थगन आदेश देते हुए कहा था कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा में कोई भी अस्पताल बायो-मेडिकल कचरे को बाहर कूड़ा-कचरा उठाने वालों को नहीं देगा। बेंच ने संबंधित राज्यों से उनके यहां काम कर रहे अस्पतालों के आंकड़े भी मांगे थे। जिसमें बताना होगा कि जैव-मेडिकल अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के उल्लंघन के लिए कितने अस्पतालों, निजी और सरकारी का निरीक्षण किया गया है। इसके अलावा इन राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह जानकारी देने के भी निर्देश NGT ने दिए थे कि उनके राज्य में कचरा प्रबंधन के लिए कितनी ईकाइंया काम कर रही हैं।

दरअसल यह निर्देश उत्तर प्रदेश के एक पत्रकार शैलेश सिंह द्वारा दाखिल एक अपील के बाद दिए गए जिसमें  शैलेश ने ऐसे सभी अस्पतालों, चिकित्सा सुविधाओं और कचरा प्रबंधन संयंत्रों को बंद करने के लिए निर्देश देने की मांगे की थी जो कचरा प्रबंधन नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।

आरोप लगाया गया कि कूड़ा उठाने वालों को इस कचरे के अनधिकृत परिवहन की अनुमति दी गई और वह लोग इसका अवैज्ञानिक तरीके से निष्पादन करते हैं।

अपील में कहा गया कि बायो-मेडिकल कचरे का इस तरह अवैज्ञानिक तरीके से निष्पादन करना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है, इसके वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन और निष्पादन की जरुरत है।

ट्रिब्यूनल ने पहले भी उत्तराखंड में अस्पतालों को जैव-चिकित्सा और ठोस कचरे के समुचित भंडारण, छांटने और निपटाने को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था और कहा था कि उल्लंघन करने पर उन्हें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के एवज़ में 50,000 रूपये का मुआवज़ा देना होगा।

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