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अगले माह स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) की बैठक होने वाली है। खबर के अनुसार, बैठक में अमेरीका, फ्रांस, ब्रिटेन, रुस और जर्मन द्वारा भारत को एनएसजी में मेंबरशिप दिलाने को लेकर चर्चा हो सकती है। देखना यह होगा कि क्या इस बार भारत को एनएसजी में एंट्री मिलती है या नहीं? क्योंकि हाल ही में रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत दौरे पर आए थे और भारत रुस को एनएसजी में मेंबरशिप के लिए मना चुका है। लेकिन चीन के अड़ियल स्वभाव के चलते भारत को एक बार फिर इसकी सदस्यता मिलने में मुश्किले खड़ी हो सकती है। चीन बार बार भारत को एनपीटी पर दस्तखत करने के लिए दबाव बना रहा है जिससे पाकिस्तान को भी एनएसजी में सदस्यता आसानी से मिल जाएगी। वहीं भारत बिना एनपीटी पर दस्तखत किए बिना नॉन एनपीटी के तहत एनएसजी में शामिल होने की कोशिश कर रहा है। गौरतलब है कि फ्रांस ने भी एनपीटी पर दस्तखत नहीं किया था लेकिन फिर भी फ्रांस को एनएसजी में शामिल कर लिया गया।

चीन क्यों नहीं देता भारत को समर्थन?

भारत की एनएसजी में सदस्यता को लेकर चीन का रूख साफ रहा है, एनएसजी में सदस्यता को लेकर चीन की सिर्फ दो मांगे हैं। दरअसल चीन एनपीटी मेंबर्स में से एक है और वह किसी नॉन एनपीटी मेंबर्स को एनएसजी में शामिल नहीं करना चाहता है। उसकी पहली मांग है कि जिसे भी एनएसजी में सदस्यता लेनी है उसे सर्वप्रथम एनपीटी पर हस्ताक्षर करने होंगे जो कि भारत नहीं कर रहा है। दूसरी मांग है कि भारत के साथ-साथ और भी परमाणु संपन्न देश (पाकिस्तान) है जिन्हें एनएसजी में सदस्यता मिलनी चाहिए। एनएसजी मसले पर हाल ही में चीन के एम्बेसडर लुओ झाओहुई ने कहा, ‘एनएसजी में एंट्री को लेकर हम किसी देश का विरोध नहीं कर रहे हमारा मानना है कि एनएसजी में सदस्यता लेने के लिए केवल नियमों को उल्लंघन न हो।’

भारत के राह में ये है रोड़े

एनएसजी में भारत की सदस्यता को लेकर चीन का रवैया साफ है लेकिन तुर्की और न्यूजीलैंड का भारत के प्रति मेंबरशिप को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी है। जबकि पिछले साल भारत दौरे पर आए न्यूजीलैंड के पीएम जॉन फिलिप ने भारत को मेंबरशिप दिलाने के लिए समर्थन देने की बात कही है।

 भारत के लिए क्यों है मेंबरशिप जरूरी?

अगर भारत सरकार को एनएसजी में सदस्यता मिल जाती है तो भारत साउथ एशिया में सीधा चीन के टक्कर में आ जाएगा। साथ ही साथ न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी और यूरेनियम बिना किसी समझौते के हासिल की जा सकेगी जो कि भारत चाहता है।

क्या है NPT?

एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप) 1968 में परमाणु अप्रसार संधि हुई जिसके तहत यह तय किया गया कि, ‘जो परमाणु संपन्न देश 1 जनवरी 1967 से पहले परमाणु परीक्षण कर चुके है, वह इस संधि का हिस्सा बनेगे।’ जबकि भारत ने 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हसन्त बुद्ध नामक पहला परमाणु परीक्षण किया था। इसका मकसद न्यूक्लियर के मटेरियल, टेक्नोलॉजी, उपकरण बनाने व इसके प्रचार प्रसार पर अंकुश लगाना है।

ये देश है NTP में शामिल

अमेरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, रुस, जर्मनी, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटिना, ऑस्ट्रिया, आयरलैंड, न्यूजीलैंड, पोलैंड, नीदरलैंड, स्विट्ज़लैंड, फिनलैंड, दक्षिण अफ्रिका, दक्षिण कोरिया, बेलारूस, बेल्जियम, ब्राजिल, बुल्गारिया, कनाडा, कजाकिस्तान, क्रोएशिया, स्पेन, स्वीडन, साइप्रस, स्लोवेनिया, डेनमार्क, इस्टोनिया, इटली, यूनान, यूक्रेन, हंगरी, चेक गणराज्य, लातविया, लिथुआनिया, लक्ज़मबर्ग, माल्टा, नार्वे, पुर्तगाल, रोमानिया, और तुर्की शामिल है।

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