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कई दिनों से यूपी के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी का पद खाली पड़ा है। ऐसे में योगी सरकार भी विपक्षियों के निशाने पर आ चुकी है। एक तरफ जहां यूपी की कानून व्यवस्था पहले से ही बिगड़ी हुई है, वहीं दूसरी तरफ यूपी के नए डीजीपी की सीट का रिक्त होना बड़ी लापरवाही दर्शाता है। लेकिन योगी सरकार अब इसमें ज्यादा देर नहीं करना चाहती और कयास यही लगाया जा रहा है कि ओपी सिंह ही यूपी के नए डीजीपी बनेंगे।  केंद्र ने यूपी सरकार से ओपी सिंह का दोबारा प्रस्ताव मांगा है। ऐसी उम्मीद लगाई जा रही है कि आज ही ओपी सिंह को केंद्र सरकार रिलीव कर देगी। वहीं सीएम दफ्तर ने ओपी सिंह की फाइल दोबारा पीएमओ को अनुमोदन के लिए भेज दिया है। हालांकि इससे पहले खबर ये भी थी कि केंद्र ने ओपी सिंह के अलावा एक और नाम को अपने पास मंगवाया है।

यूपी में ओपी सिंह कोई नया नाम नहीं है। उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक बनने से ठीक पहले ओम प्रकाश सिंह केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर थे और सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्युरिटी फोर्स (सीआईएसएफ़) के महानिदेशक की अहम ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। ओपी सिंह दो सियासी दलों के काफी करीब माने जाते हैं। एक तरफ जहां मुलायम सिंह यादव के साथ उनके करीबी रिश्ते की खबरें सुनने में आते थे तो वहीं बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी उनका उठना-बैठना था। हालांकि यूपी के सियासी गलियारों में ओपी सिंह की नियुक्ति को योगी आदित्यनाथ के जातिवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। क्योंकि ओपी सिंह से वरिष्ठ भी कई अधिकारी थे जो डीजीपी पद के लिए उपयुक्त थे लेकिन योगी सरकार ने ओपी सिंह के नाम का प्रस्ताव ही केंद्र को भेजा। ओपी सिंह से सीनियर  प्रवीण सिंह, सूर्य कुमार शुक्ला, राजीव राय भटनागर और गोपाल गुप्ता थे लेकिन इन अधिकारियों का न तो वरिष्ठ होना कोई काम आया और न ही योगी आदित्यनाथ के बिरादरी का होना।

योगी सरकार द्वारा ओम प्रकाश सिंह को अहम ज़िम्मेदारी को लेकर कई विश्लेषक इसलिए भी चौंक रहे हैं क्योंकि कभी इनकी पहचान मुलायम सिंह यादव के ख़ास अधिकारी की रही है।  यूपी के सियासी मामलों पर नजर रखने वाले लोग आज भी 2 जून, 1995 का गेस्ट हाउस कांड नहीं भूले होंगे जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर लखनऊ के मीराबाई मार्ग के स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती पर हमला कर दिया था. राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने के चलते मायावती पर ये हमला हुआ था। तब लखनऊ ज़िला पुलिस प्रमुख का पद ओम प्रकाश सिंह के पास ही था. उन पर आरोप लगा था कि उनके नेतृत्व वाली पुलिस समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं के सामने मूक दर्शक बनी रही थी। इस घटना के बाद ओपी सिंह समाजवादी पार्टी के खास आदमी बन गए। जब जब यूपी में सपा की सरकार बनीं तो मायावती के विरोध के बावजूद उनकी पदोन्नती ही हुई।

वहीं दूसरी तरफ ओपी सिंह ना केवल मुलायम सिंह के ख़ास रहे, बल्कि उनकी करीबी राजनाथ सिंह से भी रही। सीआईएसएफ़ के महानिदेशक के तौर पर उनकी नियुक्ति की एक वजह ये भी बताई जाती रही है। हालांकि ओपी सिंह को राज्य का कमान सौंपने की एक बड़ी वजह ये भी रही है कि उनके पास उत्तर प्रदेश में काम करने का अनुभव रहा है और दूसरे राजनीतिक दलों के साथ काम करने का अनुभव भी रहा है। इतना ही नहीं ओपी सिंह के एक ख़ासियत आगे बढ़कर लीडर की भूमिका निभाने वाले अधिकारी की रही है, इसकी झलक उन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही दिया था।

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