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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को आरक्षण की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने जहां आरक्षण देन की मांग उठाई है। वहीं एससी/एसटी आयोग के चेयरमैन राम शंकर कठेरिया ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों को बुलाकर आरक्षण नहीं देने के कारण पूछे हैं। कठेरिया ने केंद्रीय एचआरडी मंत्रालय से इस मसले पर बात करने को कहा है। अब तक अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी मानी जाने वाली एएमयू के बारे में जब से ये पता चला है कि यूनिवर्सिटी अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी ना होकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। तब से विश्वविद्यालय में एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को आरक्षण देने की मांग जोर पकड़ने लगी है।

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में ये मसला उठाया है। तब से बीजेपी नेताओं ने इस मुद्दे को पकड़ लिया है। अब अलीगढ़ से बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने कहा है कि जब बीजेपी समेत दूसरे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आरक्षण व्यवस्था लागू हो सकती है तो एएमयू में क्यों नहीं। सतीश गौतम कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम दोनों को ध्यान में रखते हुए इस विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी। सर सैयद अहमद खान ने विश्वविद्यालय की स्थापना की थी तो राजा महेंद्र प्रताप ने इसके लिए जमीन दान में दी थी। लेकिन बाद में इसे एक समुदाय विशेष का विश्वविद्यालय बना दिया गया।

इस मसले पर एससी/एसटी आयोग के चेयरमैन और बीजेपी नेता राम शंकर कठेरिया ने एएमयू के अधिकारियों के साथ बैठक भी की थी। कठेरिया ने अधिकारियों से कुछ सवाल भी किए थे। जिसका जवाब देने के लिए अधिकारियों ने एक महीने का वक्त मांगा है। कठेरिया का भी कहना है कि जब एएमयू अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय नहीं है तो फिर वहां एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों को आरक्षण क्यों नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने इस मसले पर केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को रिपोर्ट देने की बात कही है। उन्होंने भी कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने  अब तक आरक्षण क्यों नहीं लागू किया। इस पर उन्हें हैरानी हो रही है। अब तक किसी ने ये मसला क्यों नहीं उठाया था।

दरअसल, ये ऐसा मसला है जो बीजेपी की सियासी विचारधारा से मैच खाता है। इसलिए बीजेपी नेता इस मुद्दे को लेकर सियासी पारा गरमाने की कोशिशों में जुटे हैं। वहीं दूसरे दलों के लिए ये मुद्दा मुश्किल खड़ी कर सकता है। अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में अगर विपक्षी दल आरक्षण की वकालत करते हैं तो मुस्लिम वोट बैंक खिसकने का खतरा है। और विरोध करते हैं तो दलित और पिछड़ों के वोट से हाथ धोना पड़ सकता है।

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