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राहुल गाँधी को कांग्रेस उपाध्यक्ष से अध्यक्ष बनाने को लेकर अटकलों का बाज़ार गर्म है। कभी राहुल को अध्यक्ष बनाने की अंदरखाने मांग होती है तो 2014 से लगातार हार का सामना कर रही पार्टी के अन्दर ही इस फैसले का विरोध भी शुरू हो जाता है। कुछ शेष रहता है तो वह है बस सवाल और अनुमान कि राहुल कब और कैसे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाये जायेंगे? यह सवाल काफी दिनों से उठता रहा है। राहुल को अध्यक्ष बनने की यह मांग इसलिए भी लगातार चर्चा में है क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी चुनाव और पार्टी कार्यकर्मों से लगातार दूर हैं। इसके अलावा राहुल की आम जनता में स्वीकार्यता का डर भी बड़ी वजह है।

राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए भले ही पार्टी के अन्दर या बाहर सरगर्मी है लेकिन खुद राहुल गांधी संगठन के अन्दर होने वाले चुनाव में लड़कर जीतने के बाद ही अध्यक्ष पद पर आसीन होना चाहते हैं। कांग्रेस के अन्दर से मिली खबर और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राहुल के इस फैसले के पीछे बीजेपी को परिवारवाद के मुद्दे पर जवाब देना और कांग्रेस को लोकतान्त्रिक पार्टी बता कर इसकी छवि को मजबूत करना है। राहुल इसके माध्यम से कांग्रेस पर नेहरु गाँधी खानदान की पार्टी होने के आरोपों को भी धो देना चाहते हैं। इस प्रक्रिया का पालन कर वह विरोधियों को बताना चाहते हैं कि वह कार्यकर्ताओं की वजह से अध्यक्ष पद पर हैं न की खानदानी परंपरा की वजह से काबिज हैं।

इससे पहले कांग्रेस को संगठन चुनाव के लिए चुनाव आयोग भी कई बार कह चुका है और अब आयोग ने अंतिम निर्देश जारी करते हुए इस साल के अंत तक पार्टी को संगठन चुनावों के लिए मोहलत दी है। इन निर्देशों को देखते हुए और संगठन चुनावों की अटकलों के बीच यह माना जा रहा है कि राहुल गाँधी अक्टूबर-नवम्बर तक अध्यक्ष पद संभाल सकते हैं। हालांकि अगर राहुल चुनावों के माध्यम से ही अध्यक्ष बनेंगे तो यह प्रक्रिया काफी लम्बी होगी। ऐसे में जबकि कांग्रेस एक काफी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी है हर राज्य के ब्लाक,जिलों,और राज्य के प्रतिनिधियों का चुनाव भी एक टेढ़ी खीर है। कांग्रेस के पार्टी नियमों के अनुसार यही प्रतिनधि फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव करेंगे। कुल मिलाकर देखें तो राहुल गाँधी अध्यक्ष तो बनना चाहते हैं लेकिन इसके लिए आज तक बनाये गए लीक से हटकर नए रास्तों की तलाश जारी है।

पांच राज्यों में हाल ही में समाप्त हुए चुनावों में पंजाब को छोड़कर मिली हार के बाद राहुल गाँधी की काबिलियत को लेकर संशय और बढ़ गया। दिल्ली सहित अन्य राज्यों के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाये की कांग्रेस और राहुल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर रहे हैं। बावजूद इसके राहुल ने कोई सफाई नहीं दी है इसके अलावा अरविन्द केजरीवाल उन्हें बच्चा कह चुके हैं। वहीँ उनके खिलाफ चुनाव लड़ चुकी केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि चुनाव हार चुके नेता(राहुल गाँधी) अपने कार्यकर्ताओं से नहीं मिल रहे जबकि चुनाव जीतने वाले नेता(अमित शाह) लगातार अपने कार्यकर्ताओं के बीच हैं।

बहरहाल राहुल गाँधी का अब तक का प्रदर्शन भी कुछ अच्छा नहीं रहा है। इसे लेकर विरोधी अक्सर उनपर हमला बोलते रहे हैं। बीजेपी और मोदी के कद के सामने राहुल कहीं टिक नहीं पा रहे हैं। ऐसे में डूबती नाव बनी कांग्रेस को पुनर्जीवित करना और उसे जीत दिलाने के साथ सबको साथ लेकर चलना राहुल के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। बाकी यह तो आने वाले समय में ही देखने को मिलेगा की राहुल कब कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं और किन रास्तों पर चलकर वह इस सफ़र को पूरा करते हैं।

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