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सरकारी धन के दुरुपयोग की शिकायतों के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों की एसआईटी जांच कराने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले पर सियासत तेज हो गई है। ग्राम प्रधानों ने सिर्फ ग्राम पंचायतों की जांच पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जांच हो तो क्षेत्रीय पंचायतों और जिला पंचायतों समेत सभी तरह के फंडों का है। जिनके माध्यम से ग्राम पंचायतों में काम काज कराए गए हैं।

विपक्षी पार्टी कांग्रेस जांच का विरोध तो नहीं कर रही है। लेकिन समर्थन करने से भी डर रही है। प्रदेश के पंचायती राज मंत्री अरविंद पांडे के एक फैसले से ग्राम प्रधानों में खलबली मची हुई है। अरविंद पांडे ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिश पर ग्राम पंचायतों को मिले धन के इस्तेमाल में गड़बड़ियों की शिकायतें मिली थी। जिसके बाद सरकार ने ग्राम पंचायतों की एसआईटी जांच कराने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद से ही प्रदेश की लगभग आठ हजार ग्राम पंचायतों के प्रधान मुखर होने लगे हैं।

ग्राम प्रधानों ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं और पूछा है कि जब ग्राम पंचायतों में क्षेत्रीय पंचायत, जिला पंचायत, विधायक और सांसद निधि से भी काम कराए जाते हैं तो फिर ग्राम पंचायत निधि की जांच ही क्यों कराई जा रही है। वहीं, बीजेपी का कहना है कि सरकार की नीति भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की है। इसलिए ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जांच कराने का फैसला किया गया है।

बीजेपी तो कहती है कि जिसने कुछ गलत नहीं किया है। उसे डरने की क्या जरूरत है। इस मामले में प्रदेश कांग्रेस असमंजस की स्थिति में नजर आ रही है। ग्राम पंचायतों को धन प्रदेश में कांग्रेस शासन काल के दौरान दिए गए थे। इसलिए वो इस मामले पर गोल मोल जवाब दे रही है। दरअसल, हाल में हुई पंचायती राज विभाग की समीक्षा बैठक में गड़बड़ियों का पता चला था। सोलर लाइट, एलईडी और दूसरे सामान की खरीद बाजार मूल्य से लगभग दोगूनी कीमत पर की गई थी। तब मंत्री ने विभागीय अधिकारियों को फटकार भी लगाई थी। समीक्षा बैठक में ये पाया गया था कि कांग्रेस शासन काल के दौरान ग्राम पंचायतों की कोई समीक्षा ही नहीं कराई गई थी। अब सरकार ने 2015-16 से अब तक ग्राम पंचायतों को आवंटित धनराशि और खर्च के जांच के आदेश दिए हैं।

एपीएन ब्यूरो

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