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नोटबंदी, जीएसटी और घोटालों के बाद भारतीय बैंकों की रीढ़ की हड्डी टूट सी गई है। हालत ये है कि लोगों का भरोसा भी अब बैंकों से घटना जा रहा है। बता दें कि 55 साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि भारतीय बैंकों के राजस्व में इस कदर गिरावट दर्ज की गई है। जी हां, नोटबंदी के बाद भले ही बैंकों के पास पुराने नोटों के रूप में एक बड़ी रकम पहुंची हो, लेकिन अब बैंकों पर इसका नकारात्मक असर पड़ता दिख रहा है। बैंक डिपोजिट ग्रोथ रेट पिछले 55 सालों में सबसे कम हो गया है। मार्च 2018 को खत्म हुए वित्त वर्ष में बैंक में लोगों ने 6.7 फीसदी की दर से पैसे जमा किए। यह 1963 के बाद सबसे कम है। यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर दी गई है।

इन आंकड़ों की मुख्य वजह नोटबंदी और बैंकिंग घोटाले बताए जा रहे हैं। इसके साथ ही हाल ही में नोटों की आई कमी ने देशभर में हंगामा मचा दिया था जिसके कारण लोगों ने बड़ी तेजी से बैंकों से अपने पैसे निकाल लिए। नवंबर 2016 में नोटबंदी किए जाने के बाद तकरीबन 86 फीसदी डिपोजिट बैंकों में पहुंची थी। इससे बैंकों के पास काफी बड़ी मात्रा में डिपोजिट जमा हुआ था, लेकिन अब नोटबंदी का उल्टा असर बैंकों पर पड़ता दिख रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद जो पैसा बैंकिंग सिस्टम में आया था, वह अब निकल चुका है।

पिछले कुछ समय से लोग बैंक की बजाय म्युचुअल फंड और अन्य निवेश के विकल्पों में ज्यादा निवेश कर रहे हैं। इस वजह से भी लोगों का रुझान एफडी में कम हुआ है। 2017-18 में बैंकों में केवल 114 लाख करोड़ रुपये जमा हुए। लेकिन इसी दौरान म्यूचुअल फंड में 21.36 लाख करोड़ रुपये जमा किए गए। इसके अलावा लोगों ने इन्श्योरेंस कंपनियों से भी करीब 193 लाख करोड़ रुपये की पॉलिसी को खरीदा।

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