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बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र समेत समूचे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की समस्या के समाधान के लिये सरकार पाइप लाइन के जरिये पेयजल उपलब्ध करायेगी।  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी। प्रदेश सरकार के प्रवक्ता और स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने पत्रकारों को बताया कि केन्द्र सरकार की इस योजना के तहत पाइप लाइन के जरिये ग्रामीण क्षेत्रों में हर परिवार को 70 लीटर शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना है।

केन्द्र सरकार की इस योजना के पहले चरण में बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र के उन 6240 गांवों को चिन्हित किया गया है जहां के पानी में खतरनाक रसायन आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा अधिक है और जहां जेईएस और एईएस के मरीजों की तादाद ज्यादा है। उन्होंने बताया कि योजना का लाभ एक करोड़ 55 लाख ग्रामीण आबादी को मिलेगा। चरणबद्ध ढंग से लागू की जाने वाली इस योजना की अनुमानित लागत 14 हजार 800 करोड़ रूपये आंकी गयी है। योजना के क्रियान्वयन के लिये निविदा के जरिये सलाहकार की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जायेगी जो विस्तृत कार्ययोजना (डीपीआर) तैयार करेगा जिसके बाद परियोजना प्रबंधन इकाई की स्थापना की जायेगी।

श्री सिंह ने बताया कि केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद वर्ष 2014 में योजना की शुरूआत की गयी थी हालांकि उत्तर प्रदेश में इसके क्रियान्वयन की रफ्तार अब तक बेहद सुस्त रही है। तमिलनाडु,केरल और पंजाब के 75 फीसदी गांवों में पाइप लाइन के जरिये पेयजल की आपूर्ति हो रही है वहीं उत्तर प्रदेश में यहा आंकडा महज चार प्रतिशत है।प्रवक्ता ने बताया कि परियोजना की कुल लागत का 60 फीसदी अंशदान राज्य का होगा जबकि 40 प्रतिशत केन्द्र वहन करेगा। केन्द्र सरकार का लक्ष्य है कि 2022 तक देश की 90 फीसदी ग्रामीण आबादी को पाइप लाइन के जरिये पेयजल उपलब्ध हो जाये हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिये अभी कोई समय सीमा तय नही की है।

सरकार की मंशा है कि पहले चरण के लिये कंस्लटेंट की नियुक्ति और डीपीआर वगैरह का काम इसी साल पूरा हो जिससे योजना को रफ्तार मिल सके। योजना की देखरेख अौर क्रियान्वयन ग्रामीण विकास विभाग करेगा। श्री सिंह ने बताया कि मंत्रिपरिषद ने उच्च न्यायालय के निर्देशानुसार उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा नियमावली 1975 में संशोधन को मंजूरी दे दी है जिसके तहत पाठ्यक्रम में बदलाव किया जायेगा। जमीदारी अधिनियम के तहत पाठ्यक्रम को हटाते हुये इसके स्थान पर राजस्व आधारित पाठ्यक्रम को शामिल किया गया है। उन्होंने बताया कि पिछली 15 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मिर्जापुर मेडिकल कालेज का शिलान्यास किया था जिसके लिये मानक के अनुसार जरूरी 20 एकड़ जमीन का बंदोबस्त करने के लिये 10 एकड़ भूमि कृषि विभाग से अधिग्रहित की गयी है। मेडिकल कालेज के लिये जिला अस्पताल के पास 10.27 एकड जमीन पहले ही मौजूद है। मेडिकल कालेज की अनुमानित लागत 237. 9 करोड रूपये है।

प्रवक्ता ने बताया कि संजय गांधी स्नानाकोत्तर आर्युविज्ञान (एसजीपीजीआई) में वर्ष 2009 से निर्माणाधीन लीवर प्रत्यारोपण इकाई के भवन के लिये जरूरी 67. 19 करोड रूपये के प्रस्ताव को भी मंत्रिमंडल ने अपनी सहमति प्रदान कर दी है। उन्होने बताया कि भवन के निर्माण की शुरूआती लागत 6.67 करोड़ रूपये थी मगर निर्माण कार्य की सुस्त रफ्तार के चलते 2011 में यह लागत बढ़कर 59. 21 करोड़ रूपये हो गयी थी जिसे एक बार फिर बढ़ाकर 67.19 करोड़ रूपये किया गया। सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि भवन का निर्माण एक साल के भीतर किया जाये।

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