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दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक पर्व कुम्भ मेले को तीर्थराज प्रयाग में बसाने के लिए श्री शंभू पंच दशनाम अटल अखाड़ा की पेशवाई आराध्य देव विघ्न्हर्ता गणेश जी की वैदिक मंत्रोच्चार द्वारा पूजा-पाठ संपन्न होने के बाद परंपरागत ढ़ंग से गाजे-बाजे के साथ शुरू हुई। पेशवाई एक धार्मिक शोभायात्रा है जिसमें अखाड़ों के आचार्य, पीठाधीश्वर, महामंडलेश्वर, साधु-संत और नागा सन्यासियों का कारवां हाथी, घोड़े और ऊंट पर सवार होकर गंगा के किनारे बनी छावनी में पहुंचता है और पूरे मेले के दौरान वहां प्रवास करता है।

कुंभ नगरी में लगने जा रहे विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक मेले के लिए गुरूवार को हाथी, घोड़े, ऊंट और बैंड बाजे के साथ शैव सन्यासी सम्प्रदाय के श्रीपंच अटल अखाड़ा की लकझक पेशवाई शुरू हुई। पेशवाई में चांदी के हौदों पर अखाड़ा के महामंडलेश्वर और अन्य साधु संत सवार थे। पेशवाई सुबह दस बजे बाघम्बरी गद्दी के निकट जमात बाग से शुरू होकर बक्सी बांध पुलिस चौकी, शास्त्री पुल के नीचे से, पक्की सडक मार्ग, मोरीगंज मार्ग होते हुए गंगा पार झूंसी स्थित सेक्टर 16 में स्थापित मेला छावनी शिविर में पहुंची।

पेशवाई में सबसे आगे हाथी पर सवार साधु संत थे और उनके पीछे अखाड़े की धर्म ध्वज था। ध्वज के पीछे घोड़े पर सवार नागा साधुओं का समूह चल रहा था। इस समूह के पीछे पालकी में आराध्य देवता विघ्न्हर्ता गणेश जी विराजमान थे। इसके अगले क्रम में चांदी के हौदे पर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विश्वात्मानंद सरस्वती जी महराज समेत महमंड़लेश्वर, मंडलेश्वर, महंत आदि चल रहे थे।

शोभायात्रा की भव्यता और साधु-संतों का दर्शन करने के लिए लोगों में उत्सुकता बनी रही। विभिन्न मार्गों पर जगह-जगह शोभायात्रा में फूल-मालाओं के माध्यम से संत, महात्मा, साधु और नागा सन्यासियों को नमन किया गया। पेशवाई को देखने के लिए शाही जुलूस के दोनों ओर श्रद्धालुओं का हुजूम खड़ा था। लोग पेशवाई पर फूल वर्षा कर साधु-संतों का स्वागत कर रहे थे।

गौरतलब है कि 25 दिसम्बर से अखाड़ों की पेशवाई के सिलसिले के साथ कुम्भ मेले का शुरू हो गया। सबसे पहले जूना अखाड़ा के साथ अग्नि अखाड़ा की पेशवाई निकली। 27 दिसम्बर को आवाहन अखाड़ा और एक जनवरी को महानिर्वाणी एवं दो जनवरी को निरंजनी अखाड़े की पेशवाई हुई थी।

-साभार, ईएनसी टाईम्स

 

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