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बचपन में अक्सर गौरैया की चीं-चीं सुनाई देती थी, लेकिन अब कहीं गम हो गई है।  गर्मियों के दिनों में जब छत पर लेट कर आसमान की तरफ देखते थे तो चिड़ियों का एक बड़ा सा झुंड अपने घर की तरफ लौटता नजर आता था।  सभी गौरैयां उस झुंड में बिल्कुल सामान गति से उड़ रही थी मानों कि  सभी ने उड़ने की गति तय की हो।  लेकिन बहुत दुःख की बात है कि अब ये प्रजाति कहीं लुप्त होती जा रही है।  

आंध्र विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में ये चौकाने वाली बात सामने आई कि गौरैया की संख्या में 60 फीसदी से अधिक की कमी आई है।  ब्रिटेन की ‘रायल सोसाइटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ बर्डस’ ने इस पक्षी को ‘रेड लिस्ट’ में रखा है।   दुनियाभर में अचानक से इस पक्षी की संख्या में कमी आने से चिंता बढ़ गई है।  इसलिए पक्षियों के बचाव के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल 20 मार्च को वर्ल्ड स्पैरो डे मनाया जाता है।  साल  2010 में इसकी शुरुआत की गई।  

मुझे अक्सर याद आता है जब भी गर्मियों की छुट्टियों में गाँव जाती तो पेड़ पर चढ़ कर चिड़ियों के घोसले में झाँका करती थी, छोटी सी चिड़ि की चीं-चीं मेरा दिन बना देती थी।  दादी-नानी से चिड़ियों पर बहुत सी कहानियाँ सुनी हैं, यहां तक कि  नर्सरी से पहली दूसरी कक्षा था स्कूल की किताबों में नन्हीं चिरैयाँ की बहुत सी कविताएँ होती थी जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी से चली आ रही हैं । चिरैयाँ सिर्फ किताबों में ही नहीं बल्कि हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनी रहीं, तभी तो हमारी अध्यापिका चिड़िया के छोटे कद का उदाहरण देकर आसमान में ऊँची उड़ान भरने की बात करती थीं।  जो हमें बहुत ही लुभावना लगता था।  

कई फिल्मों में, गीतों में इस पक्षी का ज़िक्र है जो उस फिल्म और गीत की सुन्दरता को और बढ़ा देता है।  मधुर, चंचल, नटखट चिड़ि के बिना भविष्य की कल्पना करना मुश्किल है।  क्या सच में भविष्य में इनकी चीं-चीं नहीं सुनाई देगी?

नन्ही चिड़ि के गायब होने की बड़ी वजह विकास, पेड़ों, जंगलों का सफाया और अधिक संख्या में बन रहे टावर हैं।  नेटवर्क टावर से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगों से पक्षियों को नुकसान पहुँच रहा है।  हम विकास को नहीं रोक सकते लेकिन उत्तम तकनीक की मदद से पक्षियों को होने वाले नुकसान को तो रोका जा सकता हैं।  अगर पक्षियों को बचाना है तो पर्यावरण को संरक्षित रखना होगा और कई बड़े कदम उठाने होंगे।

वअगर चिड़ि हमेशा के लिए गायब हो गई तो इससे आने वाली पीढ़ी के बचपन पर जरुर प्रभाव पड़ेगा।  आगामी पीढ़ी इस पक्षी को कभी देख नहीं पायेगी और न ही इनकी चीं-चीं नहीं सुन पायेगी।

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