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तीन तलाक को गैर-कानूनी करार देने से जुड़े नए विधेयक पर लोकसभा में हंगामे के बीच  तीन तलाक बिल को पास कर दिया गया। बता दें कि जहां तीन तलाक बिल के पक्ष में 245 वोट पड़ें, वहीं  इसके विपक्ष में 11 वोट पड़े। बिल पर जब वोटिंग का वक्त आया तो कांग्रेस समेत सपा और दूसरे दलों ने सदन से वॉकआउट कर दिया।  बीजेपी सांसदों की पर्याप्त संख्या होने के चलते यह बिल लोकसभा से पास हो गया।

वहीं इससे पहले सदन में तीन तलाक बिल पेश करते हुए कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा कि यह विधेयक मुस्लिम महिलाओं को सम्मान देने, उन्हें सशक्त बनाने और बराबरी का अधिकार देने के लिए लाया गया है। इसके प्रावधानों के तहत पीड़ित महिला या उसके नजदीकी रिश्तेदार प्राथमिकी दर्ज कर सकेंगे। पीड़ित महिलाओं को संसद ही आवाज दे सकती है और इसके लिए यह विधेयक लाया गया है।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि दुनिया के 20 से अधिक इस्लामिक मुल्कों में तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया गया है। एफआईआर का दुरुपयोग न हो, समझौते का माध्यम हो और जमानत का प्रावधान हो, विपक्ष की मांग पर ये सभी बदलाव बिल में किए जा चुके हैं। यह बिल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। जब यह संसद दुष्कर्मियों के लिए फांसी की सजा की मांग कर चुकी है तो यही संसद तीन तलाक को खत्म करने की आवाज क्यों नहीं उठा सकती?

तीन तलाक विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग
लोकसभा में विपक्षी दलों ने तीन तलाक को असंवैधानिक तथा अपराध बनाने वाले विधेयक को संविधान के खिलाफ बताते हुये सरकार पर इसे जल्दबाजी में पेश करने का आरोप लगाया तथा कहा कि विधेयक को मजबूत बनाने के लिए इसे प्रवर समिति को सौंपा जाना चाहिये। मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2018 पर चर्चा की शुरुआत करते हुए रिवॉल्युशनरी सोशलिस्ट पार्टी के एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि विधेयक असंवैधानिक तरीके से पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि यह विधेयक पहले लोकसभा में 2017 में पारित किया गया था, लेकिन राज्यसभा में इसे पारित नहीं किया जा सका तो सरकार अध्यादेश के जरिये इसे फिर से लोकसभा में लायी है जो असंवैधानिक है। उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक को जल्दबाजी में लायी है। इसके लिए अध्यादेश लाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। पिछली बार इस पर व्यापक चर्चा हुई है। नियम 167 में व्यवस्था है कि यदि कोई विधेयक एक बार पारित हो गया है तो वह सदन में वापस नहीं लाया जाता है, लेकिन इस सरकार ने गैर-संवैधानिक काम कर इस विधेयक को फिर सदन में पेश किया है। इसके बावजूद, पहले इस पर चर्चा के दौरान जो सुझाव दिये गये थे उन्हें विधेयक में शामिल नहीं किया गया है। प्रेमचंद्रन ने कहा कि इस विधेयक में की गयी व्यवस्था के अनुसार, पति तीन साल तक जेल में रहेगा। तो सवाल यह है कि वह पत्नी को गुजारे की राशि कैसे देगा। उन्होंने कहा कि विधेयक जल्दबाजी में तैयार किया गया है, इसलिए इसमें इस तरह की बहुत खामियाँ हैं। इसलिए, विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना चाहिये।

कांग्रेस की सुष्मिता देव ने कहा कि इस विधेयक पर पहले हुई चर्चा के दौरान उनकी पार्टी ने कई संशोधन दिए थे, लेकिन उनको विधेयक में शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक को राजनीतिक लाभ अर्जित करने के मकसद से पेश किया गया है और इसलिए यह कमजोर है। अत: इसे प्रवर समिति को सौंपा जाना चाहिये। सुष्मिता देव ने कहा है कि सरकार गलत तरीके से यह विधेयक लायी है और इसके बहाने वोट बैंक की राजनीति की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में 300 पेज के उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया है लेकिन उसमें कहीं नहीं कहा गया है कि सरकार इस बारे में अध्यादेश लेकर आए। मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण के नाम पर अपराधीकरण को महत्व दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार यदि सचमुच मुस्लिम महिलाओं को उनका हक देना चाहती है और उन्हें न्याय देना चाहती है तो इस विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना चाहिए।

मीनाक्षी लेखी ने मोदी सरकार को महिलाओं के हक के लिए काम करने वाली सरकार बताया और कहा कि वह पांच साल के कार्यकाल में महिलाओं को सशक्त बनाने तथा उनके हितों के संरक्षण से संबंधित 50 योजनाएं लायी हैं। उन्होंने कहा कि जब तक पुरुष महिलाओं के साथ उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए खड़े नहीं होते हैं महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई नहीं जीती जा सकती है। उनका कहना था कि सभी दलों के लोगों को मुस्लिम महिलाओं को न्याय देने के लिए एकजुट होना चाहिए और इस विधेयक को पारित करना चाहिए ताकि उन्हें न्याय मिल सके। उन्होंने कहा कि तीन तलाक में सिर्फ पुरुष को ही अधिकार दिया गया है कि वह महिलाओं जब चाहे तलाक दे। यह महिलाओं को दबाने का प्रयास है जबकि कुरान में महिला सम्मान को महत्व दिया गया है लेकिन कुछ लोगों ने स्त्री को दबाए और कुचले रखने के लिए व्यवस्था के स्वरूप को बिगाडा है। उन्होंने कहा कि फोन पर संदेश भेजकर, फोन करके या अन्य तरीके से तीन बार तलाक कहकर किसी महिला के जीवन को बर्बाद करने की छूट को समाप्त किया जाना चाहिए और इसके लिए यह विधेयक पारित किया जाना जरूर है।

अन्नाद्रमुक के अनवर रजा ने भी विधेयक को टालने या प्रवर समिति को सौंपने की मांग की। उन्होंने इस विधेयक में तीन साल की सजा के प्रावधान को निरंकुश करार देते हुये कहा कि इससे तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और खराब होगी। उन्होंने कहा कि इस विधेयक को या तो ठंडे बस्ते में डाल दिया जाये या प्रवर समिति को भेजा जाये।

तृणमूल कांग्रेस के सुदीप बंदोपाध्याय ने विधेयक में मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण की चिंता को तो जायज करार दिया, लेकिन उन्होंने तलाक देने वाले मुस्लिम पतियों के लिए किये गये सजा के प्रावधान को अनुचित एवं निरंकुश करार दिया।

मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुये मुस्लिम महिलाओं की दुर्दशा के लिए पुरानी कांग्रेस सरकारों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि 1986 में शाहबानो मामले में कांग्रेस ने जो ‘लम्हों में खता की, उसकी सजा सदियों’ ने भुगती है। नकवी ने कहा कि तमाम इस्लामिक देशों ने तीन तलाक को गैरकानूनी करार देकर कब का निरस्त कर दिया है, लेकिन भारत में अब भी शरीयत कानून जारी है।

शिवसेना के अरविंद सावंत ने विधेयक का समर्थन करते हुये कहा कि इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को सबसे ज्यादा खुशी हो रही होगी। उन्होंने कहा कि इस कानून का मकसद किसी को जेल भेजना नहीं बल्कि डराना है कि यदि तीन तलाक का कदम उठाया तो उन्हें जेल जाना होगा।

तेलंगाना राष्ट्र समिति के जितेंद्र रेड्डी ने सरकार की मंशा और विधेयक लाने के लिए यह समय चुनने पर सवाल उठाते हुये कहा कि सरकार को किसी धर्म विशेष में दखलअंदाजी से बचना चाहिये। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संविधान की धारा 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि यदि यह विधेयक पारित हो गया और कानून बन गया तो इसे बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों की जिंदगी को नियंत्रित करने वाला माना जायेगा। उन्होंने सरकार से राजनीतिक हथकंडे अपनाने की बजाय मुस्लिम महिलाओं के कल्याण के लिए गंभीर कदम उठाने की माँग की।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम ने विधेयक का विरोध करते हुये इसे अनावश्यक बताया। उन्होंने तीन तलाक पर ही एक अन्य विधेयक के राज्यसभा और संसदीय समिति के पास लंबित होने का जिक्र करते हुये कहा कि समिति की रिपोर्ट का इंतजार किये बिना इस मुद्दे पर अध्यादेश और अब नया विधेयक लाकर सरकार संसदीय समितियों का अपमान किया है। तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखे जाने को गलत बताते हुए उन्होंने सरकार पर मगरमच्छ के आंसू बहाने का आरोप लगाया और कहा कि वह अन्यायपूर्ण समाज का निर्माण कर न्याय नहीं दिला सकते। सलीम ने कहा कि यदि सरकार मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाना चाहती है तो पहले सांप्रदायिक हिंसा को रोकना होगा क्योंकि इससे सबसे ज्यादा परेशानी मुस्लिम महिलाओं को ही होती है। उन्होंने भी इसे संसदीय समिति के पास भेजने की मांग की।

तीन तलाक पर ईरानी ने विपक्ष को दिया करारा जवाब

कपड़ा मंत्री स्म़ृति ईरानी ने लोकसभा में तीन तलाक से जुड़े मुस्लिम महिला (विवाह एवं संरक्षण) विधेयक, 2018 को राजनीति से प्रेरित बताने की विपक्ष की बात का करार जवाब  देते हुये आज कहा  कि इस पर उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद भी 477 महिलायें तलाक-ए-बिद्दत की शिकार हुई है। ईरानी ने इस विधेयक पर गरमागरम चर्चा के दौरान संक्षिप्त हस्तक्षेप करते हुये  विधेयक का विरोध करने वाले दलों को करारा जवाब  दिया। विपक्ष के इस सवाल पर  कि यह दीवानी मामला है इसे आपराधिक श्रेणी में क्यों रखा जा रहा है, श्रीमती ईरानी ने कहा  कि इस देश ने वह मंजर भी देखा है जब यह कहा जाता था  कि दहेज लेना और देना दो पक्षों की रजामंदी है- इसके बावजूद दहेज को आपराधिक मामला बनाया गया  तथा सती प्रथा के खिलाफ कानून बना।  मुस्लिम विवाह को अनुबंध बताने पर उन्होंने कहा कि कोई भी करार एकतरफा समाप्त नहीं होता और यदि होता है उसके परिणाम भी होते हैं। मुस्लिम विवाह से जुड़े 1986 के कानून को अपर्याप्त बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि उस कानून में ताकत होती तो शायरा बानो को उच्च्तम न्यायालय जाने की जरूरत क्यों पडती।

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