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डोनाल्ड ट्रंप के वक्तव्य ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे अमेरिका क्या, मालदीव के राष्ट्रपति होने लायक भी नहीं हैं। उन्हें पेरिस के जलवायु समझौते को तोड़ना था तो वे उसे जरुर तोड़ते, लेकिन उन्हें भारत पर इतने मूर्खतापूर्ण और अश्लील आरोप लगाने की क्या जरुरत थी?

उनके यह कहने का अर्थ क्या है कि पेरिस समझौते पर दस्तखत करने के लिए भारत ने समृद्ध राष्ट्रों से अरबों डॉलर खाए हैं। अरबों डॉलर, अरबों डॉलर, अरबों डालर- उन्होंने तीन बार कहा है। जबकि सच्चाई यह है कि भारत को 2015 में सारी दुनिया से 3.1 बिलियन डॉलर की मदद मिली है। अमेरिका से तो सिर्फ 10 करोड़ डॉलर मिले हैं। इस साल उसे भी सिर्फ 3.4 करोड़ डॉलर किया जा रहा है। ट्रंप का उक्त बयान भारत के लिए बेहद अपमानजनक है।

लेकिन नरेंद्र मोदी का अमेरिका जाना तय है। वे जरुर जाएं लेकिन ट्रंप से नाक रगड़वाए बिना नहीं। उन्होंने रुस में रहते हुए ट्रंप को जो जवाब दिया, वह बहुत अच्छा और मर्यादित था। उसके लिए मोदी शाबाशी के पात्र हैं। मोदी ने कहा कि पेरिस समझौता हो, न हो, भारत तो प्रकृतिप्रेमी देश है।

हजारों साल पहले से वेद कहते चले आ रहे हैं, पृथ्वी माता है और मैं उसका पुत्र हूं। पेरिस समझौते का पालन करना भारत का धर्म है। मोदी ने ट्रंप का नाम भी नहीं लिया, यह भी अच्छा किया। हो सकता है कि भारत, रुस और चीन के नेता ट्रंप को पटा लें और वह अपने सनकीपन से निजात पा ले।

ट्रंप का यह कहना ठीक है कि उन्हें अमेरिका के हितों की रक्षा सबसे पहले करनी है। लेकिन मैं उनसे पूछता हूं कि क्या अमेरिका इस दुनिया का हिस्सा नहीं है? यदि सारी दुनिया की जलवायु शुद्ध होगी तो क्या अमेरिका की नहीं होगी? दुनिया में सबसे ज्यादा गंदगी फैलाने वाला देश अमेरिका ही है।

उनका यह कहना भी ठीक है कि उन्हें पेरिस के नहीं, पिट्सबर्ग के लोगों ने चुना है लेकिन पिट्सबर्ग के लोग क्या किसी दूसरी दुनिया में रहते हैं ? वास्तव में ट्रंप ने पेरिस समझौते का बहिष्कार करके सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को ही पहुंचाया है। उनकी अपनी पार्टी के कई नेताओं, कई बड़ी अमेरिकी कंपनियों और प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों ने उनकी निंदा की है। अमेरिका अपने प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं करेगा तो कुछ वर्षों बाद वह रहने लायक नहीं रहेगा। लोग वहां से भागने लगेंगे।

ट्रंप ने पेरिस समझौते से बाहर निकलकर विश्व राजनीति की लगाम अब चीन को थमा दी है। हस्ताक्षरकर्ता 194 राष्ट्र एक तरफ हैं और बहिष्कारकर्ता अमेरिका दूसरी तरफ। अब अमेरिका निकारागुआ और सीरिया के श्रेणी में चला गया है, जिन्होंने इस समझौते पर दस्तखत नहीं किए हैं। ट्रंप ने अमेरिका के 200 बिलियन डॉलर, जो पेरिस समझौते के तहत उसे देने बाकी थे, बचा लिये लेकिन उन्होंने अमेरिका को अब दुनिया की पवित्र जलवायु का शत्रु बना दिया है। उनके नाटो साथियों ने भी उनके खिलाफ संयुक्त बयान जारी किया है। ट्रंप को सर्वत्र धिक्कारा जा रहा है।

डा. वेद प्रताप वैदिक

Courtesy: http://www.enctimes.com

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