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भारत के प्रधानमंत्री मोदी म्यांमार दौरे पर हैं। म्यांमार भारत के प्रमुख रणनीतिक पड़ोसी देशों में शामिल है और यह उग्रवाद प्रभावित नगालैंड और मणिपुर सहित कई पूर्वोत्तर राज्यों के साथ 1,640 किमी लंबी सीमा साझा करता है। प्रधानमंत्री ने वहां के राष्ट्रपति यू हतिन क्याव से मुलाकात की कुछ तस्वीरें ट्वीट कर कहा, राष्ट्रपति यू हतिन क्याव के साथ मुलाकात शानदार रही। उन्होंने म्यांमार के राष्ट्रपति को सालवीन नदी (जो तिब्बत के पठार से निकल कर अंडमान सागर तक बहती है) की धारा का 1841 के नक्शे का एक नया रूप और बोधि वृक्ष की एक प्रतिकृति भी सौंपी। मोदी दो देशों की अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर म्यांमार में हैं। प्रधानमंत्री ने यहां के विश्वप्रसिद्ध आनंद मंदिर को देखने पहुंचे । जिसकी तस्वीरों को उन्होंने टट्वीट भी किया।

म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ जातीय हिंसा की घटनाओं में तेजी आने के बीच प्रधानमंत्री की यह यात्रा हो रही है। मोदी म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू च्यी  के साथ साझा बयान में पीएम मोदी ने कहा, ”शांति के लिए आप जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, वह हम समझते हैं।” उन्होंने कहा, ”पड़ोसी देश होने के नाते सुरक्षा के क्षेत्र में हमारे हित एक जैसे हैं, इसलिए हमें मिलकर काम करना चाहिए।” प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, भारत और म्यामांर की लंबी जमीनी तथा समुद्री सीमाओं पर सुरक्षा एवं स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण है। रखाइन प्रांत में हिंसा के मुद्दे पर भारत म्यामांर के साथ खड़ा है जिसमें ढेर सारे लोगों की जानें गईं। हम चाहते हैं कि सभी पक्ष म्यांमार की एकता और क्षेत्रीय अखंडता को संरक्षित रखने की दिशा में काम करें। बातचीत में म्यांमार की रोहिंग्याओं के मुद्दे पर चर्चा हुई।

म्यांमार का पुराना नाम बर्मा था और 1948 से पहले म्यांमार में ब्रिटिश शासन था। ब्रिटिश शासन के समय अंग्रेज म्यांमार को भारत का ही हिस्सा मानते थे और मजदूरी के लिए रोहिंग्या मुसलमानों को बर्मा ले जाते थे। बर्मा 4 जनवरी 1948 को ब्रिटिश उपनिवेशवाद के चंगुल से मुक्त हुआ और वहाँ 1962 तक लोकतान्त्रिक सरकारें निर्वाचित होती रहीं।  ऐसे में वर्ष 1948 में म्यांमार की आजादी के बाद देश का नागरिकता कानून बना।  इसमें रोहिंग्या मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया। 1962 में सैन्य विवाद हुआ तो सत्ता मिलिट्री के हाथों मे आ गई । म्यांमार में सन् 1982 में एक और नागरिक कानून के जरिए रोहिंग्या मुसलमानों की नागरिकता पूरी तरह छीन ली गई। इस कानून से शिक्षा, रोजगार, यात्रा, विवाह, धार्मिक आजादी और स्वास्थ्य सेवाओं के लाभ से भी उनको महरूम कर दिया गया। दरअसल यह ताजा तनाव 25 अगस्त से शुरू हुआ जब कुछ लोगों द्वारा म्यांमार के कुछ पुलिस चौकियों पर हमला किया गया जिसमें 10 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए। तब से यह विवाद दिन पर दिन बढ़ते ही जा रहा है।

भारत सरकार अपने देश में रोहिंग्या प्रवासियों को लेकर भी चिंतित हैं। यह उन्हें स्वदेश वापस भेजने पर विचार कर रही है। समझा जाता है कि करीब 40,000 रोहिंग्या भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। भारत में कांग्रेस सरकार के समय इन रोहिंग्याओं को जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, यूपी और राजस्थान में बसाया गया। लेकिन अब सरकार इन शरणार्थियों को वापस म्यांमार भेजने की तैयारी कर रही है।

यह मोदी की म्यांमार की पहली द्विपक्षीय यात्रा है। उन्होंने 2014 में आसियान भारत सम्मेलन में शरीक होने के लिए भी म्यांमार की यात्रा की थी।

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