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अविश्वास का प्रस्ताव एक ऐसा संसदीय प्रस्ताव है, जिसे पारंपरिक रूप से विपक्ष द्वारा संसद में एक सरकार को हराने या कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है या दुर्लभ उदाहरण के रूप में ये एक तत्कालीन समर्थक द्वारा पेश किया जाता है, जिसे सरकार में विश्वास नहीं होता। ये प्रस्ताव नये संसदीय मतदान (अविश्वास का मतदान) द्वारा पारित किया जाता है या अस्वीकार किया जाता है।

मौजूदा वक्त में केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव को लेकर नोटिस दिया गया, लेकिन हंगामे की वजह से इस प्रस्ताव पर चर्चा तक नहीं हो पा रही। संख्याबल के हिसाब से बीजेपी की सरकार भले ही मजबूत स्थिति में हो लेकिन सहयोगी दलों की ओर से उपेक्षा का आरोप लगाते हुए अविश्वास जाहिर करने का फैसला करना, किसी भी सरकार के लिए असहज हो सकता है।

तमाम विपक्षी पार्टियां सरकार के 4 सालों के कामकाज को मुद्दा बनाकर बढ़त हासिल कर सकती थीं, लेकिन एक राज्य विशेष के मुद्दे पर एकजुटता दिखाने का प्रयास करना, बहती गंगा में हाथ धोने के जैसा माना जा रहा है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में सदन की कार्रवाई का सुचारू रूप से चलना, सबसे बेहतर होता है लेकिन सिर्फ सरकार पर दबाव बनाने की खातिर अविश्वास के नाम पर सदन की कार्रवाई को बाधित करना ठीक नहीं है,क्योंकि इससे नुकसान जनता का ही होता है।

ये बात सच है कि राजनैतिक दलों को हर उस मुद्दे पर सियासी रोटियां सेंकने का बेसब्री से इंतजार रहता है, जो उनकी सियासत मे चार-चांद लगा सके लेकिन सिर्फ सियासत चमकाने के नाम पर आम जनता के हितों की अनदेखी करना, किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता।

ब्यूरो रिपोर्ट एपीएन

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