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देश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में आये दिन हमारे जवानों के शहीद होने की ख़बरें आम हो गयी हैं.. हर हमले में जवानों के शहीद होने के बाद मुख्यमंत्री, देश के गृहमंत्रीप्रधानमंत्री सभी के संवेदनापूर्ण और नक्सली हमलों को कायराना हरकत बताने, नक्सलियों से सख्ती से निपटने, शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने देने जैसे भावनात्मक बयान आ जाते हैं…शहीदों को गार्ड आफ आनर, परिजनों को मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है…हर नक्सली हमले के बाद नयी रणनीति पर विचार करने की बात होती है…तथाकथित उच्च स्तरीय बैठकों का दौर और नक्सल प्रभावित राज्यों के मंत्रियों, सुरक्षा अधिकारियों की आपात बैठक में नक्सलियों से लड़ने के लिए एक साझा प्लान तैयार करने की घोषणा की जाती है..नक्सली भी उस दौरान शांति बनाए रखते हैं और जैसे ही रस्म अदायगी की सरकारी कवायद पूरी होती हैं शहीदों के परिजनों के आंसू सूख भी नहीं पाते हैं कि पहले से भी बड़ा एक नक्सली हमला हो जाता है, भारी संख्या में नए शहीद और फिर उसी सिलसिले को दोहराया जाता है, नये संवेदनापूर्ण बयान और नई रणनीति की बात.. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि चाहे 2010 में दंतेवाड़ा में अभी तक का सबसे बड़ा हमला हो जिसमें 75 जवान मारे गए थे…या फिर 2013 में झीरम घाटी का हमला हो जहां कांग्रेस के नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था..या अभी हाल ही में सुकमा में हुआ नक्सली हमला हो जहां 9 जवान शहीद हुए हों…

एक बात तो तय है कि इन नक्सली गतिविधियों के बारे में भी समाज और सरकार में विभिन्न राय हैं…कुछ सामाजिक और मानवाधिकार संस्थाएं जहां नक्सली समस्या को एक सामाजिक राजनीतिक समस्या मानते हैं और समस्या का बातचीत से शांतिपूर्ण हल निकालने के पक्षधर हैं तो कुछ लोग इसे केवल क़ानून व्यवस्था की समस्या मानते हैं… समय समय पर नक्सल प्रभावित इलाकों में सेना की तैनाती की मांग भी कुछ हलकों से उठती रही है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें इस तरह की मांगों को ख़ारिज करती रही हैं…छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पिछले कुछ वक्त ही लगातार हमलों में हमारे कई जवान शहीद हो गए.. दर्जनों घायल हैं जिनमें से कई जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं…सवाल यह है कि इन नक्सलियों पर इतने आधुनिक हथियार व शक्तिशाली विस्फोटक आते कहां से हैं कि वह एंटी लैंडमाइन व्हीकल्स के भी परखच्चे उड़ा देते हैं…सेना के हैलिकोप्टर को भी निशाना बनाते हैं..

लगता है नक्सलियों के लगातार हावी होने में भ्रष्टाचार भी एक प्रमुख कारण है…आप खुद सोचिए कि जंगल में नक्सलियों के पास इतना गोला बारूद और अत्याधुनिक हथियार आखिर कहां से पहुंचते हैं…न तो इस क्षेत्र में कोई समुद्री सीमाएं हैं न ही वायु मार्ग से ये सब साजो सामान उपलब्ध हो रहे हैं..फिर आखिर यह कैसे इन तक पहुंच रहे हैं…निश्चित तौर पर सड़क मार्ग ही एक जरिया है…तो फिर वहां कि पुलिस और सरकार को कैसे इसकी खबर नहीं होती..कभी सोचा है आपने ?? वक्त आ गया है कि अब सरकार और सामाजिक संगठनों को भी अपनी सोच बदलनी पड़ेगी…क्योंकि निहत्थे आदिवासियों को भी मौत के घाट उतारने में किसी प्रकार की  कोई कसर नहीं छोड़ते हैं नक्सली… किसी भी समस्या के शांतिपूर्ण हल से किसी को परहेज नहीं हो सकता लेकिन जब शान्तिपूर्ण तरीकों से किसी प्रकार का हल निकलने की कोई संभावना नहीं बची हो तो समस्या का सैन्य हल ही बचता है…भले ही उसके लिए नक्सल प्रभावित पूरे इलाके को सेना के ही सुपुर्द ही क्यों न करना पड़े..केंद्र और राज्यों की सरकारों को यह सोचना पड़ेगा कि आखिर नक्सली हमलों में हमारे जवानों के शहीद होने का यह अंतहीन सिलसिला कब तक चलेगा ?

 –एपीएन ब्यूरो

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