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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी संभालते ही कई ऐसे कामों की झड़ी लगा दी है, जिससे सारे देश में उनकी वाहवाही हो रही है। वे टीवी चैनलों और अखबारों में छाए रहे। इतने ज्यादा छाए रहे कि उन्हें देखकर हमारे प्रचारप्रेमी प्रधानमंत्री भी बेचैन हो जाते होंगे। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि योगी और मोदी के बीच आत्म-प्रचार की प्रतिस्पर्धा छिड़ गई है।

योगी तो योगी हैं। धुन के धुनी हैं। उन्हें जो ठीक लगता है, उसे वे कर डालने पर आमादा हो जाते हैं। अब किसी ने उनको पट्टी पढ़ा दी है कि उप्र के बच्चों को प्राथमिक कक्षा में अंग्रेजी अनिवार्य रुप से पढ़ाई जाए। कोई आश्चर्य नहीं कि योगी इसे लागू करने पर उतारु हो जाएं। इसके पीछे उनका आशय क्या हो सकता है? यही कि उप्र के बच्चे अगर अंग्रेजी अच्छी जानेंगे तो उन्हें नौकरियां भी अच्छी-अच्छी मिलेंगी।

वे केरल, तमिलनाडु और बंगाल के उम्मीदवारों के मुकाबले पिछड़ेंगे नहीं। योगी का यह सदाशय है, दुराशय नहीं लेकिन योगी अगर सारे मसले को ठीक से समझ लें तो उन्हें पता चलेगा कि यह दुराशय से भी बुरा है। यह बुद्धि-द्रोह है। अक्ल का दिवाला है। दुनिया के किसी भी महाशक्ति राष्ट्र में बच्चों के लिए विदेशी भाषा अनिवार्य नहीं है। बच्चों पर विदेशी भाषा थोपना हिरण पर घास लादने के बराबर है बल्कि मैं तो यह कहूंगा कि हिरणों को गधा बनाना है। बच्चों की मौलिकता नष्ट करनी हो, उन्हें मंद-बुद्धि बनाना हो, उनकी हीनता-ग्रंथि मजबूत करनी हो, उन्हें रट्टू तोता बनाना हो, उन्हें नकलची का रुप देना हो तो उन पर विदेशी भाषा अवश्य थोप दीजिए।

सारे संसार के श्रेष्ठ शिक्षाशास्त्रियों की यही राय है। बड़े होकर ये बच्चे जरुरत होने पर एक नहीं, कई विदेशी भाषाएं पढ़ें, ऐसी सुविधा अवश्य होनी चाहिए। योगी अंगूठा टेक संन्यासी नहीं हैं। पढ़े-लिखे हैं। विचारशील हैं। उनसे मैं आशा करता हूं कि वे भारत के ऐसे पहले मुख्यमंत्री कहलाएं, जिसने भारत की भाषाई गुलामी की जड़ों को मट्ठा पिला दिया हो।

याने वे सरकारी नौकरियों की भर्ती से अंग्रेजी की अनिवार्यता हटवाएं, जिसके कारण ही लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी की भाड़ में झोंकने के लिए मजबूर हो जाते हैं। योगी को चाहिए कि कम से कम वे स्व. भैरोंसिंहजी शेखावत का अनुकरण करें। उन्होंने राजस्थान का मुख्यमंत्री बनते ही अपने सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया था कि वे हर सरकारी दस्तावेज़ पर अपने हस्ताक्षर हिंदी में ही करें।

डा. वेद प्रताप वैदिक

Courtesyhttp://www.enctimes.com

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