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बीजेपी सरकार ने अपने घोषणा पत्र में किए गए वादे के अनुसार उत्तर प्रदेश में भले ही किसानों का कर्ज माफ कर दिया हो, लेकिन किसानों को दी गई इस सौगात से अर्थव्यव्स्था पर जोखिम पड़ने के आसार हैं। गौरतलब है कि भारत को यह आइना दिखाया है अमेरिकी ब्रोकरेज फर्म ने, फर्म का मानना है कि ऐसे कदमों से साल 2019 के लोकसभा चुनावों तक अर्थव्यवस्था पर ये बोझ जीडीपी का 2 फीसदी हो जाएगा।

दरअसल, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों को राहत देते हुए 5 बिलियन डॉलर यानि 36,359 करोड़ रुपए का कर्ज माफ किया था, जो कि राज्य की जीडीपी का 0.4 फीसदी है। ऐसे में अन्य राज्यों में कर्जमाफी को लेकर वकालत की जा रही है और अनुमान है कि विपक्षी दल या अन्य राज्यों की सरकारें भी यह कदम उठा सकती हैं। हालांकि केंद्र सरकार की ओर से पहले ही इस बात को साफ तौर पर कहा जा चुका है कि अपनी वित्तीय स्थितियों को मद्देनजर रखते हुए ही इस प्रकार के फैसले लें क्योंकि केंद्र सरकार इन फैसलों में कोई आर्थिक मदद नहीं करेगी। अन्य राज्यों के वित्तीय हालत पर नजर डालें तो भारत के अधिकतर राज्य 3.5 फीसदी से ज्यादा का राजकोषीय घाटा झेल रहे हैं और इस तरीके के फैसले राजकोषीय और ब्याज दर पर भारी पड़ सकते हैं।

बतो दें कि उत्तरप्रदेश में कर्ज माफी के बाद इसकी मांग  महाराष्ट्र, हरियाणा और तमिलनाडु समेत कई  राज्यों में हो रही है। मद्रास हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि पूरे कृषि कर्ज को माफ किया जाए। मगर इससे राज्य के राजकोष पर 4000 करोड़ रुपए की मार पड़ जाएगी। फर्म से पहले भारतीय स्टेट बैंक, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों ने भी कर्जमाफी को लेकर चिंता जाहिर थी। बैंक ऑफ अमेरिका के मेरिल लिंच ने नोट जारी करके हुए भारत को अर्थव्यवस्था के खतरे से अवगत कराया और साथ ही आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल की सराहना की, क्योंकि उन्होंने कर्जमाफी से होने वाले खतरों की बात करते हुए सवाल उठाए थे।

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