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सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत उन तमाम गांवों को ओडीएफ़ यानि खुले में शौचमुक्त घोषित किया है जहां सरकार का दावा है कि गांव में अब सभी घरों में शौचालय बन गए हैं और वहां कोई भी व्यक्ति शौच के लिए बाहर नहीं जाता। तो क्या सचमुच ऐसा हुआ है इसकी जमीनी हकीकत की पड़ताल करने के लिए एपीएन की टीम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ के गृह जिला गोरखपुर के सहजनवां तहसील के खीरीडांड़ गांव में पहुंची। खीरीडाड़ गांव को सरकार ने खुले में शौचमुक्त घोषित कर दिया है। लेकिन जब हम इस गांव में पहुंचे तो सरकारी दांवे जमीन पर औंधे मुंह पड़ी दिखी हालांकि ओडीएफ घोषित इस गांव में पहले की तुलना में इस बार ज्यादा शौचालय नजर आए। लेकिन अभी भी कई शौचालयों का निर्माण अधूरा ही है।

सरकारी दस्तावेजों में इस गांव को ओडीएफ घोषित कर सरकार भले ही अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन यहां मामला तो आंकड़ों की बाजीगरी का है। अभी भी इस ओडीएफ गांव में शौचालयों का निर्माण चल रहा है। कई शौचालय तो दिखाने के लिए बन गए हैं, उनमें आकर्षक रंगों वाले दरवाजे भी लगा दिए गए है लेकिन नजदीक जाने पर पता चला कि उन शौचालयों में अभी तो छत ही नहीं बना है। तो वहीं कई शौचालय के कमरे तो बने है लेकिन दरवाजे नहीं लगे है। यानि आधे-अधूरे शौचालयों को पूर्ण शौचालय दिखा कर ओडीएफ का तमगा हासिल कर लिया गया।खीरीडाड़ गांव में कुल 542 शौचालय बनाने का लक्ष्य रखा गया था। लेकिन हकीकत तो ये है कि प्रशासन अपने लक्ष्य से अभी काफी दूर है। गांव में अभी करीब 250 से 300 शौचालय ही बने है। जबकि बाकी का काम चल रहा है।

इनमें से कुछ तैयार होने के करीब है तो कुछ का निर्माण कार्य अभी शुरू ही नहीं हुआ है। गांव में शौचालय के लिए बने गड्ढे खुले पड़े है। कई गड्ढों में ढक्कन नहीं लगे हैं जिससे कई बार जानवर और बच्चों के गिरने का डर बना रहता है। ये स्थिति स्वच्छता अभियान के प्रति अधिकारियों की गंभीरता पर सवाल खड़ी करती है। अधिकारी अपनी नाकामी को छिपाने और वाहवाही लूटने के लिए गांव को ओडीएफ तो घोषित करवा लिया लेकिन गांव में आज भी लोग शौचालय नहीं होने की वजह से खुले में शौच के लिए जा रहे है और गांव गंदा हो रहा है। इस गांव को खुले में शौचमुक्त घोषित कर दिया गया है लेकिन आपको जान कर हैरत होगी कि गांव वालों को इसकी जानकारी तक नहीं है। जब हमने गांव वालों को बताया तो उन्हें भी हैरत हुआ कि जब गांव में सभी घरों में शौचालय बने ही नहीं है तो फिर इसे ओडीएफ कैसे घोषित किया जा सकता है

वही इस गांव में कई लोग ऐसे भी है जिनके घर में शौचालय नहीं है फिर भी  उन्हें शौचालय बनाने के लिए सरकार के तरफ से सहायता राशि नहीं मिली। उनका नाम शौचालय के लाभार्थियों के लिस्ट से गाय़ब है।  ऐसे जब सभी को शौचालय नहीं मिलेगा तो फिर गांव कैसे खुले में शौचमुक्त हो सकेगा ये बड़ा सवाल है सरकारी दस्तावेजों में ओडीएफ घोषित हो चुके इस गांव के प्रधान के पति उमेश चंद जो खुद को प्रधान का प्रतिनिधि कहते है और प्रधान की सारी जिम्मेदारी निभा रहे है, उनसे बात की तो उनका कहना है कि 20-25 दिनों में वो सभी 542 शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य पा लेंगे।

अजीब सरकारी आंकड़ों का खेल है ये। हर योजना में गड़बड़झाला। प्रधानमंत्री की सबसे महत्वाकांक्षी योजना भी इससे अछूती नहीं रही। पीएम की लाख कोशिशों के बावजूद देश आज भी गंदगी के बीच खड़ा है लेकिन कागजों में सब कुछ साफ सुथरा नजर आता है। सरकार की नजर में अपना नंबर बढ़ाने के लिए अधिकारी आंकड़ों में हेरफेर का खेल खेल रहे हैं और सरकार उन्हीं आंकड़ों के आधार पर स्वच्छता अभियान की कामयाबी का ढिंढोरा पीट रही है। हैरत की बात तो ये है कि ये फर्जीवाडा उस जिले में हो रहा है जो खुद सीएम का गृह जिला है। ऐसे में बाकी जिलों का क्या हाल होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है

-ब्यूरो रिपोर्ट, एपीएन

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