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यूपी की योगी सरकार ने सपा शासनकाल में शुरू हुई उर्दू के 4000 सहायक अध्यापकों की भर्ती निरस्त कर दी है। सरकार का कहना है कि प्राथमिक स्कूलों में मानक से कहीं ज्यादा संख्या में उर्दू शिक्षक तैनात हैं। इसलिए अब और उर्दू शिक्षकों की जरूरत नहीं है। बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रभात कुमार ने बताया कि प्रदेश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में उर्दू विषय के करीब 87 हजार विद्यार्थी हैं, जबकि उर्दू विषय के 16 हजार से अधिक शिक्षक हैं।

डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि अखिलेश सरकार ने अपने शासनकाल में तीन बार उर्दू शिक्षकों की भर्ती हुई थी, जिसमें परिषदीय विद्यालयों में लगभग 7000 उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी। पहली बार 2013 में उर्दू शिक्षकों की भर्ती के लिए 4280 पदों की घोषणा की गई। फिर इनमें से शेष पदों की भर्ती के लिए 2014 में दूसरी बार भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी।

वहीं, तीसरी बार उर्दू शिक्षकों के 3500 पदों के लिए 2016 में शासनादेश जारी हुआ था। 15 दिसंबर 2016 में चार हजार उर्दू सहायक अध्यापकों की भर्ती निकाली थी। 7500 से अधिक अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। नई सरकार के गठन के बाद 22-23 मार्च 2017 को प्रदेश भर में उर्दू शिक्षक भर्ती के लिए काउंसलिंग की गई। 23 मार्च 2017 को ही योगी सरकार ने सहायक अध्यापक और उर्दू विषय के अध्यापकों की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगा दी। करीब एक वर्ष तक सरकार ने भर्ती प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया।

कुछ अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने सरकार को दो महीने में भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के लिए कहा था। इस मामले में यूपी सरकार हाईकोर्ट में रिव्यु पेटिशन फाइल करके सूचित करेगा। बता दें कि अखिलेश सरकार ने इससे पहले तीन बार में 7780 उर्दू शिक्षकों की भर्ती की थी।

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