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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में एक तरफ नामांकन का दौर जारी है तो दूसरी तरफ कई पार्टियां अपने उम्मीदवारों पर अब भी माथापच्ची में जुटी हैं चुनावों में अक्सर ऐसा होता रहा है कि जिसको टिकट नहीं मिला वहीं नाखुश हो जाता है लेकिन इस बार के चुनावों में टिकट से जुड़ी हर कवायद अहम मानी जा रही है क्योंकि चुनावी घमासान में एक दूसरे को पछाड़ने के लिए कोई भी पार्टी दांव-पेच में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। इस दौरान बगावत के रंग भी देखने को खूब मिल रहे हैं। लेकिन फिलहाल जिस कवायद पर सबसे ज्यादा नजर है वो है उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन। जिसके तय होने को लेकर कांग्रेस ने दो दिन पहले ही बयान दे दिया था लेकिन सवाल है कि अगर गठबंधन तय है तो फिर एलान में देरी किस बात की है?

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गुरूवार 19 जनवरी को एपीएन न्यूज के खास कार्यक्रम मुद्दा में यूपी में पक रही गठबंधन की खिचड़ी पर चर्चा हुई। इस अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल थे। इन लोगों में गोविंद पंत राजू (सलाहकार संपादक एपीएन न्यूज), ओंमकार नाथ सिंह (प्रदेश महासचिव यूपी कांग्रेस), मधु गुप्ता (प्रवक्ता सपा), शिवकरन सिंह ( राष्ट्रीय महासचिव आरएलडी), पार्सा वेंकटेश्वर राव (वरिष्ठ पत्रकार) वीरेन्द्र सिंह मस्त (सांसद बीजेपी) शामिल थे। इस कार्यक्रम का संचालन एंकर अक्षय ने किया।

ओंकार नाथ सिंह ने कहा कि नाराजगी नहीं है। शीर्ष नेतृत्व की बातचीत चल रही है उसका नतीजा का क्या आया है इसकी अभी जानकारी नही है। इस दल को भी सोचना होगा कि सीटों के बटवारे में एक सम्मानजनक स्थान हो। ऐसा ना लगे कि समर्पण की भावना है। अभी समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के मध्य बातचीत चल रही है और एक-दो दिन में सबको पता चल जायेगा।

शिवकरन सिंह ने कहा कि पहले हमारे नेता ने सबको आंमत्रित किया था कि आइये हम सब मिलकर चुनाव लड़े और सांप्रदायिक ताकतों को दूर करें। लेकिन समाजवादी पार्टी स्वार्थी पार्टी लग रही है। इनकी ना राजनीति की भावना है ना विकास की भावना है। जिस प्रकार से इन्होने पिछली बार घोषणा पत्र बनाया था इस बार भी झूठा घोषणा पत्र बनाकर गुमराह करना चाहते हैं। समाजवादी पार्टी गलतफहमी में है। चुनाव के बाद इनकी भी वही हालत होने वाली है जो अभी बीजेपी की है। ये सत्ता में नही आने वाले है। अबकी बार किसान इनको बिल्कुल वोट नही देगा। समाजवादी पार्टी के नेता जब अपने परिवार की बात नही सुनते हैं तो किसानों की बात कहा सुनेंगे।

मधु गुप्ता ने कहा कि कोई भी परेशानी नही है। निश्चित तौर पर जिस प्रत्याशी को टिकट नही मिलता है वो निर्दलीय लड़ता है या किसी और पार्टी में जाता है इसमें कोई नई बात नही है। नेता जी कोई भी निर्णय ले सकते हैं इसमें हम कुछ नही कह सकते हैं।

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गोविंद पंत राजू ने कहा कि विवाद सीटों की संख्या को लेकर है। संख्या को लेकर जब पहले विवाद शुरु हुआ था तो आरएलडी को गठबंधन से बाहर होने की घोषणा करनी पड़ी थी। क्यों कि उनको जितनी सीटें देने की बात की जा रही थी वो उनकी अपेक्षा से बहुत कम थी। गठबंधन कर कांग्रेस आगे आना चाहती है पर ये भी चाहती है कि उनको हिस्सेदारी इतनी मिले कि बाद में कांग्रेस एक बड़ी राजनैतिक दल के तौर पर पहचान बना सके। जहां तक समझौते के लिए  लिए समाजवादी पार्टी की बात है तो पहले से इस तरह के संकेत है कि 90 सीटें वो कांग्रेस को देने के लिए तैयार है। गठबंधन का जो पेंच फंस रहा है वो सीटों के बटवारे को लेकर है।

वीरेन्द्र सिंह मस्त ने कहा कि बीजेपी की स्थिति और परिस्थिति इतनी अनुकूल है कि भारी संख्या में लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं। लेकिन चुनाव लड़ने का फैसला तो एक आदमी के पक्ष में हो सकता है। हम अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं का सम्मान करते हैं और कार्यकर्ता की सहमति से ही कोई निर्णय लेते हैं। बीजेपी कार्यकर्ता प्रधान पार्टी है और दलों की तरह नही है।

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