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डा. वेद प्रताप वैदिक

विश्व बैंक की इस साल की रपट में भारत अपने 130 वें पायदान से ऊंचा उठकर 100 वें पायदान पर पहुंच गया है। याने उसने 30 पायदान की ऊंची छलांग लगा दी है। ऐसी अच्छी छलांग दुनिया के मुश्किल से सिर्फ 10 देशों ने लगाई है। किस बात की छलांग लगाई है, भारत ने? यह छलांग है- व्यापार करने की सुविधाओं में और रोजगार पैदा करने के सुधारों में! इन क्षेत्रों में इस वर्ष भारत के नंबर 56.05 से बढ़कर 60.76 हो गए! इस रपट को हमारी भोली सरकार अपनी सफलता का प्रमाण-पत्र मान रही है। हमारे वित्त मंत्री फूले नहीं समा रहे हैं। इस तथ्य पर वे अपनी पीठ ठोक रहे हैं कि 190 देशों में भारत का स्थान 100 वां हो गया है। याने वे 90 देशों से ऊपर हैं लेकिन वित्त मंत्रीजी को क्या इतनी भी समझ नहीं है कि भारत अब भी दुनिया के 99 देशों से पीछे हैं? वह भूटान से 25 सीढ़ी नीचे हैं। क्या यह गर्व की बात है?
इसके अलावा, विश्व बैंक की यह रपट जीएसटी के पहले की है। यदि जीएसटी का समय जोड़ लिया जाए तो भारत लुढ़ककर 100 से 130 नहीं, शायद 150 वें स्थान पर पहुंच जाएगा। आज देश के व्यापारी जितने परेशान हैं, उतने वे पहले कभी नहीं हुए। जितनी तेजी से लोग बेरोजगार हो रहे हैं, क्या उतने पहले कभी हुए? गुजरात का चुनाव जीतने के लिए सरकार जीएसटी के कान रोज़ मरोड़ रही है, रोज उसके पंचर जोड़ रही है, रोज उसको बेसाखियां लगा रही है।  इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार बिल्कुल मूढ़ और अकर्मण्य है। उसने अर्थ—व्यवस्था को सुधारने के लिए अनेक पहल की हैं। जैसे नोटबंदी, जीएसटी, विदेशी निवेश को आमंत्रण, बैंक कर्जों की वसूली, जन-धन खाते आदि लेकिन नेताओं के नौसिखिए और अनुभवशून्य होने ने इन सभी पहलों को बांझ साबित कर दिया है। व्यापार को सरल बनाने के लिए कई नियमों और प्रक्रियाओं में उसने अच्छे सुधार किए हैं लेकिन उनके सगुण-साकार नतीजे अभी तक सामने नहीं आए हैं। घाघ नौकरशाहों ने हमारे भोले भंडारियों की उल्टे उस्तरे से हजामत कर दी है। अब यह उन पर निर्भर है कि वे कौनसी गोली को पसंद करते हैं? विश्व-बैंक की इस ताजा रपट को अफीम की गोली की तरह सटककर वे मस्त हो जाते हैं या इसका सेवन जुलाब की गोली की तरह करके वे अपने दिमागी कब्ज से छुटकारा पाते हैं?

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