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ईरान की संसद पर हुआ हमला, भारत की संसद पर हुए आतंकी हमले की याद दिलाता है। आतंकियों ने वर्तमान ईरान के सबसे बड़े नेता आयतुल्लाह खुमैनी की समाधि को भी नहीं छोड़ा। 12 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हो गए। इस आतंकी हमले का श्रेय सीरिया के ‘दाएश’ या आईएसआईएस ने लिया है। यह शिया ईरान पर सुन्नी आतंकियों का हमला है। ईरान में सुन्नियों पर वहां की सरकार और आम जनता भी कड़ी नजर रखती है। खास तौर से तब जबकि वे अरब हों। उनके फारसी के अटपटे उच्चारण से ही वे तुरंत पहचाने जाते हैं। इसीलिए वहां आतंक की घटनाएं कम ही होती हैं लेकिन इस समय अरब देशों ने ईरान के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। ईरान समर्थक देश, क़तर, पर प्रमुख अरब देशों ने अभी-अभी तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी ईरान के खिलाफ हैं। ऐसे में आईएसआईएस को यह मौका मिल गया है कि वह ईरान पर हमला करे। यों भी ईरान की सरकार सीरिया के शासक बशर-अल-असद का समर्थन करती है और दाएश के लोग उसके खिलाफ युद्ध छेड़े हुए हैं। क़तर पर आतंकवाद का आरोप लगाने वाले खुद कई मुस्लिम देशों के आतंकवादियों की मदद करते रहे हैं। वे ईरान पर हुए हमले की भर्त्सना सच्चे मन से नहीं कर रहे हैं जबकि ईरान खुलकर बोल रहा है कि यह हमला सउदी अरब ने करवाया है। इधर जब ट्रंप ने सउदी अरब में सभी मुस्लिम राष्ट्रों को संबोधित किया था तो उस सम्मेलन में ईरान को नहीं बुलवाया गया था। इधर रुस के साथ भी ईरान के संबंध घनिष्ट होते जा रहे हैं। इस दृष्टि से इस ईरान-विरोधी आतंकवाद को यदि बड़े राष्ट्रों का आशीर्वाद मिल रहा हो तो कोई आश्चर्य नहीं है। ईरान के कुछ नेताओं ने कहा है कि ईरान चुप नहीं बैठेगा। इसका अर्थ क्या हुआ ? अब ईरान भी आतंक का जवाब आतंक से देगा। यह पश्चिम एशिया के लिए बहुत घातक होगा ? इस तरह की घटनाओं से दुनिया में इस्लाम की छवि को भी धक्का लगता है। ये कैसे इस्लामी देश हैं कि आपस में ही लड़ते रहते हैं ? भारत-जैसा निष्पक्ष और सर्वमित्र राष्ट्र ऐसे मौकों पर चाहे तो सक्रियता दिखा सकता है।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक

Courtesy: http://www.enctimes.com

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