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देवशयनी एकादशी व्रत आज यानि शुक्रवार को है। इसे पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी भी कहा जाता है। गृहस्थ आश्रम में रहने वालों के लिए चातुर्मास्य नियम इसी दिन से प्रारंभ हो जाते हैं। संन्यासियों का चातुर्मास्य 16 जुलाई को यानी गुरु पूर्णिमा के दिन से शुरू होगा।

इसलिए होती है देवशयनी एकादशी महत्वपूर्ण

देवशयनी एकादशी नाम से पता चलता है कि इस दिन से श्री हरि शयन करने चले जाते हैं। इस अवधि में श्री हरि पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं। भगवान विष्णु कार्तिक शुक्ल एकादशी, जिसे देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, के दिन पाताल लोक से अपने लोक लौटते हैं। इसी दिन चातुर्मास्य नियम भी समाप्त हो जाते हैं।

चातुर्मास्य शब्द सुनते ही उन सभी साधु-संतों का ध्यान आ जाता है, जो चार मास एक ही स्थान पर रहते हुए लोगों को धर्म संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराकर सत्य पर आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। चातुर्मास्य आषाढ़ शुक्ल एकादशी (इसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठावनी या देवोत्थान एकादशी) तक होता है। सनातन धर्म में चातुर्मास्य की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जिसका अनुकरण आज भी हमारे साधु-संत करते हैं।

जानें पूजा का शुभ मुहूर्त
इस साल हरिशयनी एकादशी 11 जुलाई को रात 3:08 से 12 जुलाई रात 1:55 मिनट तक रहने वाली है। प्रदोष काल शाम साढ़े पांच से साढे सात बजे तक रहेगा। माना जाता है कि इस दौरान की गई आरती, दान पुण्य का विशेष लाभ भक्तों को मिलता है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान को नए वस्त्र पहनाकर, नए बिस्तर पर सुलाएं क्योंकि इस दिन के बाद भगवान सोने के लिए चले जाते हैं।

देवशयनी एकादशी पर व्रत रखने का होता है खास महत्व

देवशयनी एकादशी पर व्रत रखें। और सोना, चाँदी, ताँबा या पीतल की भगवान विष्णु की मूर्ति बनवाकर उसका यथोपलब्ध उपचारों से पूजन करें। पीले वस्त्र से विभूषित करके सफेद चादर से ढके हुए गद्दे तकिए वाले पलंग पर भगवान को शयन कराएं।

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