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सेंट स्टीफंस कॉलेज में इस साल ऐडमिशन के लिए इंटरव्यू के लिए सुप्रीम काउंसिल का भी एक सदस्य पैनल में होगा। सुप्रीम काउंसिल ताकत के मामले में कॉलेज के गवर्निंग बॉडी से ऊपर है। इस काउंसिल में उत्तर भारत में चर्च के सदस्य या उनकी तरफ से नॉमिनेटेड सदस्य होंगे। कॉलेज प्रशासन की तरफ से चर्च के प्रभाव को कॉलेज में बढ़ाने की यह दूसरी कोशिश है। हालांकि, स्थायी शिक्षकों ने इस फैसले का पुरजोर विरोध किया है।

कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल वाल्सन थंपू ने 2015 में चर्च के दखल को बढ़ाने की पहल की थी। सुप्रीम काउंसिल को फैकल्टी की नियुक्ति और ऐडमिशन में भी दखल देने का अधिकार काउंसिल को इस प्रावधान के तहत देन का ऐलान उन्होंने किया था। हालांकि, इसे लागू नहीं किया जा सका। हालांकि, कॉलेज प्रशासन के इस फैसले की कुछ शिक्षक आलोचना भी कर रहे हैं। तीन शिक्षक नंदिता नारायण (गणित विभाग), एन पी एशले (अंग्रेजी) और अभिषेक सिंह (अर्थशास्त्र) ने संयुक्त बयान जारी कर इस प्रस्ताव की आलोचना की।

शिक्षकों की तरफ से जारी बयान में कहा गया, ‘प्रिंसिपल जॉन वर्गीज के द्वारा लिए गए इस अवैध और गैर-कानूनी फैसले की हम आलोचना करते हैं।’ तीनों शिक्षकों ने इस फैसले को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि इससे कॉलेज के अकादमिक श्रेष्ठता और ऐडमिशन प्रक्रिया बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है। शिक्षकों का कहना है कि अब तक इंटरव्यू पैनल में सिर्फ अकैडमिक सदस्य ही होते हैं और यह पहली बार होगा जब किसी ऐसे सदस्य को पैनल में शामिल किया जाएगा जो अकैडमिक क्षेत्र से नहीं है।

कॉलेज में चर्च के दखल को बढ़ाने की कोशिश के फैसले के खिलाफ 2015 में 21 टीचरों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, शिक्षकों के विरोध के बाद कॉलेज प्रशासन प्रिंसिपल थंपू के फैसले को लागू नहीं कर सका। इस फैसले को लागू करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि यह प्राथमिक तौर पर दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रावधानों का उल्लंघन था। अगर कॉलेज प्रशासन फैसले को लागू करता तो इसका असर कॉलेज की मान्यता पर भी पड़ सकता था। इसके साथ ही सेंट स्टीफंस के 106 साल पुराने संविधान के IV और V धारा का भी यह उल्लंघन होता।

सोमवार को स्टाफ काउंसिल की मीटिंग में प्रिंसिपल वर्गीज ने ऐलान किया कि कॉलेज के ऐडमिशन के लिए सुप्रीम काउंसिल के भी प्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। मीटिंग में मौजूद स्थायी शिक्षकों ने पुरजोर तरीके से इस प्रस्ताव का विरोध किया। शिक्षकों ने कॉलेज के संविधान के धारा IV और V का उल्लंघन बताते हुए इस प्रावधान का विरोध किया।

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