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इस वक्त पर्वों का मेला चल रहा है। नवमी, दशहरा, दिवाली और आज गोवर्धन पूजा। जी हां, आज गोवर्धन पूजा का त्यौहार बड़े ही हर्षोउल्लास से मनाया जा रहा है। इसकी धूम भगवान श्री कृष्ण की नगरी मथुरा में देखी जा सकती है। गोवर्धन पूजा के मौके पर मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों को फूलों की माला से सजाया जाता है। “हरे राम-हरे कृष्ण” के भजन-कीर्तन से मंदिर का परिसर गूंज उठता है।

मथुरा में स्थित गोवर्धन धाम में सदियों से चली आ रहीं परंपरा का विधान देखा जा सकता है। यहां ना केवल देशी भक्त आते हैं बल्कि विदेशी भक्तों का ताता भी देखा जा सकता है। भगवान श्री कृष्ण के दर्शन के लिए उमड़े मंदिरों में भक्तों की भीड़ आस्था का परिचय देती है। बता दें दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर समूचे उत्तर भारत में गोवर्धन पर्व बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन गाय माता की भी पूजा भी की जाती है।

गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा –

गोवर्धन-पूजा करने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अपनी अंगुली पर उठाया था। साथ ही भगवान कृष्ण ने वर्षा के देवता इंद्र का अभिमान भी चकना चूर कर दिया था। दरअसल, द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज वासियों से आग्रह किया कि वे वर्षा के देवता इंद्र की पूजा छोड़ गोवर्धन पर्वत की पूजा करें। क्योंकि पर्वत पर ढेर सारे पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं का वास होता है और इन्हीं की वजह से वर्षा होती है। इस बात पर क्रोधित इंद्र ने मुसलाधार बारिश की। बारिश इतनी तेज थी कि थमने का नाम नहीं ले रहा था। इससे पूरा ब्रज जलमग्न होने लगा, पशु-पक्षीयों को अन्न मिलना मुश्किल हो गया। तब भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगुली पर उठा लिया, जिसके नीचे ब्रज के सारे निवासी और पशु-पक्षी आ गए और अपने आप को बारिश के प्रकोप से बचा लिया।

गोवर्धन-पूजा में होती है गाय की पूजा-

गोवर्धन पूजा में गायों की पूजा की जाती है। शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे नदियों में गंगा। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। गाय के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोवर्धन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की पूजा की जाती है। जैसा कि इस गोवर्धन पर्वत की पूजा का भी विधान है। अगर किसी के पास गाय नहीं है तो वो किसी दूसरे गाय की पूजा कर सकता है। मान्यता है कि आज के दिन घर में बने भोजन को पहले माता गाय दिया जाता है। उसके बाद परिवार के सारे सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।

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