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चीन में ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबोर) सम्मेलन शुरु हो गया है। भारत उसमें भाग नहीं ले रहा है। मैं चाहता था कि भारत उसमें भाग ले और अपना पक्ष डटकर रखे। भारत को मनाने-पटाने की बजाय चीन की गुस्ताखी देखिए कि उसके सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ में भारत के विरुद्ध बहुत ही गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी निकली है। उसमें कहा गया है कि यदि अब भारत ‘ओबोर में शामिल होगा तो उसे बहुत छोटी भूमिका मिल सकती है यानी चीन आखिर भारत को क्या समझता है? क्या भारत मंगोलिया और कंबोडिया है? क्या भारत, पाकिस्तान की तरह चीन के कंधे पर लदा हुआ देश है ? क्या भारत चीन के साथ सहयोग करने के लिए घुटने टेकता हुआ जाएगा ? क्या वह चीन के आगे दंडवत करेगा?

यह ठीक है कि चीनी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने ऐसा नहीं कहा है लेकिन तानाशाही राष्ट्र अपने सरकारी अखबारों के जरिए सब कुछ कहलवा देते हैं। वहां के अखबार भारत के अखबारों और चैनलों की तरह आजाद नहीं होते। यदि चीनी सरकार का यही दृष्टिकोण है तो भारत को अपनी कमर कसनी होगी। वह ‘ओबोर’ का दोयम दर्जे का सहयोगी कदापि न बने। उसे चाहिए कि वह पड़ोसी देशों और आग्नेय एशिया के देशों के साथ अपने जल-थल-वायु मार्ग द्विपक्षीय स्तर पर इतनी जल्दी आगे बढ़ाए कि चीन देखता ही रह जाए। द्विपक्षीय व्यापार इतना बढ़ जाए कि ‘ओबोर’ उसके आगे पानी भरे।

ये सब राष्ट्र भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के ज्यादा निकट हैं। इसमें शक नहीं है कि चीन हमारे पड़ोसी देशों को अरबों रु. कर्ज देकर उन्हें अपने साथ खींच रहा है लेकिन भारत चाहे तो इन राष्ट्रों को वह चीनी ठगाई से सावधान कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम चीन के विरुद्ध कोई कूटनीतिक युद्ध ही शुरु कर दें। यदि चीन सम्मानूपर्वक भारत का सहयोग लेना चाहे तो भारत तैयार रहे, वरना भारत को चीन से दबने की जरुरत नहीं है।

हमारे नेताओं की दिक्कत यह है कि वे भारत के भविष्य के बारे में राष्ट्रवादी नहीं, धृतराष्ट्रवादी हैं। उनकी कोई दृष्टि है ही नहीं। यदि वे सच्चे राष्ट्रवादी होते तो वे एशियाई महासंघ (जिसे मैं प्राचीन आर्यावर्त्त कहता हूं) बनाने की कोशिश करते। यह महासंघ दुनिया के सभी महासंघों से कहीं अधिक शक्तिशाली होता। इसके बनने पर चीन ही क्या, रुस और अमेरिका भी अपनी भूमिकाओं के लिए भारत की ओर टकटकी लगाते।

डा. वेद प्रताप वैदिक

Courtesyhttp://www.enctimes.com

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