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कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इस पूरे वाक्य में अभिन्न पर जाकर नजरें अटक जाती हैं.. खासकर ये सोचकर, कि जब हमने कभी ये नहीं कहा, कि उत्तर प्रदेश हमारा अभिन्न अंग है या बंगाल हमारा अभिन्न अंग है, बिहार हमारा अभिन्न अंग है। तो फिर ये कहने की जरुरत क्यों पड़ी, कि जम्मू कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है। इस पर जब हम विचार करेंगे, तो मिलेगा कि, अनुच्छेद 370 और अभिन्न अंग बोलने में आपसी संबंध है ।  जब हम भारत का नक्शा देखते हैं, तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक नजर आता है। लेकिन, इसी एकरुपता में अनुच्छेद 370 अंतर पैदा करता है।

अनुच्छेद 370 के कारण ही जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा रहकर भी खुद को उस तरह से यहां की मिट्टी में आत्मसात नही कर पाया था, जैसा की दूसरे राज्यों ने और वहां के लोगों ने किया। आर्टिकल 370 से मिले विशेषाधिकारियों के कारण ही जम्मू कश्मीर के लोग एक तरह से देश के बाकी लोगों से कटे हुए थे और कहीं ना कहीं ये अलगाववाद को आग दे रहा था। अनुच्छेद 370 हटाने और बचाने के संदर्भ में संसद में कई तर्क पेश किए गए.. लेकिन, इनमें एक भी तर्क ऐसा नहीं था, जो ये बता सके कि, पिछले 70 साल में अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को क्या हासिल हुआ।

अनुच्छेद 370 के हटने का सबसे ज्यादा असर उस पड़ोसी पर हुआ, जो आतंकवाद और अलगाववाद के नाम पर हमसे जम्मू-कश्मीर को छीनना चाहता था। पाकिस्तान को ये बार ये भरोसा ही नहीं हुआ, कि ऐसा भी हो सकता है। और जब उसे अहसास हुआ तो लगा कि पूरे पाकिस्तान में भूचाल आ गया है, पाक सरकार और सेना पागलों की तरह उधर से उधर दौड़ लगाने लगे। कश्मीर में मानवाधिकारों की दुहाई दी जाने लगी, अलगाववादियों और आतंकवादियों के समर्थन में नारे लगने लगे। मामला संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के तमाम देशों तक पहुंचा।

यहां पर सरकार की डिप्लोमैसी काम आयी। जो लोग ये आरोप लगाते रहे थे, कि प्रधानमंत्री मोदी का सारा ध्यान सिर्फ विदेश यात्राओं पर है, उन्हें भी ये मानने को विवश होना पड़ा, कि दमदार विदेश नीति के दम पर ही भारत ने कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर करारी शिकस्त दी। उस जम्मू कश्मीर में जहां कर्फ्यू और सुरक्षाबलों की तैनाती के बाद भी पत्थरबाजी होती थी, देश के खिलाफ नारे लगते थे, वहां आज अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भी स्थिति नियंत्रण में है। इसके पीछे की गई मुकम्मल तैयारी और ढ्ढ राजनीतिक इच्छाशक्ति का बड़ा हाथ है। जुमे की नमाज, बकरीद और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भी कश्मीर शांत रहा। ये दिखाता है कि आम कश्मीरी बदलाव और सरकार के साथ मिलकर विकास की राह पर बढ़ने को तैयार है।

स्थितियां धीरे-धीरे सामान्य हो रही हैं, लोग घरों से निकलने लगे हैं, स्कूल-दफ्तर खुल गए हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को भी चाहिए, कि इस मौके पर बजाए राजनीति के वो राज्य के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों का बढ़ावा दें। कश्मीर कल भी हमारा था, आज भी हमारा है और अनंतकाल तक हमारा ही रहेगा।

  • आनन्द पाल सिंह
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