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कान्हा के व्यक्तित्व के बहुत सारे पहलू है जो अपने आप में बेजोड़ है। कृष्ण ने जिस दिन जन्म लिया वो अपने आप में एक अनूठा अवसर था। पंचांग उलटकर देखा जाए तो दुनिया में कभी ऐसा नही होता कि एक पर्व में हमेशा ग्रहों का योग एक ही बनता हो , लेकिन ये जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर ऐसी स्थिति बनती है क्योंकि जन्माष्टमी पर रोहिणी नक्षत्र होता है और वृष राशि में चंद्रमा होता है। रात को अष्टमी तिथि होती है।

अगर भगवान कृष्ण के जन्म का समय देखा जाए तो भादों का महीना, साल के बिल्कुल मध्य में आता है। उसमें भी कृष्णपक्ष और अष्टमी तिथि में भी मध्य रात्रि 12 बजे , इसलिए भगवान कृष्ण आकर्षण के केंद्र हैं तभी तो कहा जाता है कि “कर्क इति सह कृष्ण:”अर्थात् जो अपनी ओर खींचे वह ही कृष्ण है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करते थे उनके आततायी पुत्र कंस ने उन्हें गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी के साथ हुआ था ।

कंस को अपनी बहन देवकी अत्यन्त प्रिय थी …एक समय कंस अपनी बहन देवकी को स्वयं उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। तभी अचानक रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस! जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसा है। इसकी गर्भ से उत्पन्न होने वाला आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर सहसा कंस देवकी को मारने के लिये उठा कि न देवकी रहेगी और न ही उसका पुत्र …तभी देवकी ने कंस से विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हे दे दूंगी ,मुझे मत मारो। कंस ने देवकी की बात मान ली और वासुदेव व देवकी को कारागृह में डाल दिया।

वासुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस मार डालता था। जिस समय वासुदेव-देवकी को आठवां पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी। वासुदेव नवजात शिशु-रूपी श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु कृष्ण को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए।

बाद में जब कंस को सूचना मिली कि वासुदेव-देवकी के बच्चे का जन्म हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या अचानक आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। कालांतर में कंस ने नंदलाला को मारने की कोशिशे की लेकिन कंस के सब प्रयत्न विफल हुए और बाद में भगवान कृष्ण के हाथों आतताई कंस का वध हुआ।

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