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विरासत की सियासत के नाम पर देश में राजनीति हमेशा फलती फूलती रही है। हर पार्टी के पास महापुरुषों की अपनी तथाकथित विरासत है। नेहरू और गांधी कांग्रेस का संबल बनकर उभरे तो दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी बीजेपी के नायक बने। राम मनोहर लोहिया को समाजवादी पार्टी ने अपना सियासी संबल बनाया, तो संविधान निर्माण में अहम योगदान देने वाले बाबा साहेब अंबेडकर को बीएसपी ने दलितों के मसीहा के रुप में दिखाया। सत्ता परिवर्तन के साथ विचारों का परिवर्तन अकाट्य सत्य है। लेकिन एक सत्य ये भी है कि सत्ता परिवर्तन के साथ उन तमाम महापुरुषों और उनसे जुड़ी यादों की मिटाने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं.. जो सत्ताधारी दल को सूट नहीं करतीं। पार्टियां अपनी सुविधानुसार तय करती हैं कि, उनके दौर में कौन सा नेता या कौन सा महापुरुष सर्वमान्य होना चाहिए।

कांग्रेस पर आरोप लगता रहा है, कि उसने नेहरू परिवार और गांधी को छोड़कर किसी और विचारधारा को पनपने नहीं दिया तो वहीं बीजेपी पर दीनदयाल उपाध्याय और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कद बढ़ाने और नेहरू परिवार की यादों को मिटाने का आरोप लगता रहा है। कमोवेश यही हालत उन छोटी-छोटी पार्टियों की भी है जो अपने-अपने राज्यों में सत्ता में आती-जाती रहती हैं। राजनीति में आज इस कदर परिवर्तन हो गया है कि, रंग, धर्म और जाति तक का बंटवारा हो गया है। आखिर लेनिन, अंबेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और गांधी की मूर्ति तोड़ने से क्या हासिल होगा। क्या एक मूर्ति तोड़ देने से उन विचारों का खात्मा हो जाएगा, जो लोगों के दिलों में मूर्त रुप ले चुकी हैं। मूर्तियों को तोड़ना दरअसल, मानसिक खोखलेपन की निशानी है, इसके अलावा कुछ नहीं।

विचारधारा के कारण किसी का विरोध तो किया जा सकता है, लेकिन इसे खारिज भी नहीं किया जा सकता, कि किसी के विचारों को दबाया जाना संभव नहीं है, क्योंकि विचार मूर्तियों और किताबों में नहीं बल्कि लोगों के दिलों में बसते हैं। ये जरूरी नहीं कि हम किसी और के विचारों से सहमत हों लेकिन उसके खिलाफ हिंसा पर उतर आने को भी जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस बात पर मार्क्सवाद की विचारधारा को लेकर सैद्धांतिक बहस हो सकती है। लेकिन, किसी भी समाज में किसी भी विचारधारा को ताकत के बल पर दबाया नहीं जाना चाहिए। भारत का इतिहास ऐसा तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां दक्षिणपंथी, वामपंथी और तमाम दूसरी विचारधाराओं के बीच विचारो को लेकर बहस हुई है, और कई बार इसने हिंसा का रुप लिया है। लेकिन, एक सच ये भी है, कि तमाम दबावों के बाद भी ऐसी विचारधाराएं फलती और फूलती रही हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता ही उसकी असल पहचान है, ऐसे में इसे बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। यहां सदियों से तमाम विचारों, धर्मों और संप्रदायों के लोग साथ रहते आए हैं और हमारे ऊपर ये जिम्मेदारी है कि हम उस सामाजिक संरचना को उसी रूप में बरकरार रखें

—एपीएन डेस्क

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