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रेलवे के इतिहास में कार्रवाई का एक अनूठा मामला समने आया है। जिसमें 12 साल पहले लेट हुई ट्रेन की जांच करने पर रेलवे मजिस्ट्रेट को ही सेवा से अनिवार्य सेवा निवृत कर दिया गया था लेकिन अब उन्हें न्याय मिल गया है। वहीं मामले की सुनवाई करने वाले हाई कोर्ट ने अपने गलत फैसले को स्वीकार करते हुए खुद पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।

दरअसल रेलवे मजिस्ट्रेट मिंटू मलिक सियालदह में पोस्टिंग थे। उन्हें पांच मई 2007 को सियालदह जाना था। वह लेक गार्डन रेलवे स्टेशन पर खड़े होकर सियालदह लोकल ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। ट्रेन 15 मिनट देरी से पहुंची इस ट्रेन की पहले से शिकायतें मिलती थीं। इस पर मजिस्ट्रेट ने अपनी कोर्ट में लोकोपायलट(चालक) और गार्ड को तलब कर लिया।

इस घटना के बाद रेलवे यूनियन पदाधिकारियों ने मजिस्ट्रेट के खिलाफ प्रदर्शन किया रेलवे प्रशासन ने जांच बैठा दी। कमेटी ने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कार्रवाई करने का मामला मानते रिपोर्ट पेश की। अनुशासनात्मक कमेटी की इस रिपोर्ट के आधार पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट मिंटू को जबरन रिटायर करने का आदेश दिया।

अंग्रेजी अखबार में छपी खबर के मुताबिक अपने खिलाफ आए फैसले को उन्होंने हाई कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच के सामने चुनौती दी। 2017 में हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने उनकी रिट खारिज कर दी तो उन्होंने डबल बेंच के सामने इसे चुनौती दी। डबल बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को गलत मानते हुए खुद पर यानी कलकत्ता हाई कोर्ट पर ही एक लाख रुपये का जुर्माना लगाते हुए मजिस्ट्रेट को नौकरी से बहाल करने का आदेश दिया।

यह आदेश जस्टिस संजीव बनर्जी और सुर्वा घोष की बेंच ने हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश को पलटते हुए दिया। कलकत्ता हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एक तरफ कुछ लोग गलत होता देखकर ध्यान नहीं देते, ऐसे में एक मजिस्ट्रेट ने ट्रेनों के संचालन में देरी को अपने स्तर से कुछ दुरुस्त करने की कोशिश की तो उसे जबरन रिटायरमेंट दे दिया गया। कोर्ट ने सिस्टम पर तंज भी कसते हुए कहा,” इस न्यायिक अफसर की सोच मूर्खतापूर्ण थी कि वह अकेले ही माफिया से लड़ लेगा।”

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